Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 493 of 699

Read in context
Page 493

कां० ३, अ० ७-८, ब्रा० ४-१, कं० ११ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४७५
अपने वैभव को ही मिलाओ, शरीरों को नहीं।' क्योंकि अगर वह मिला दें तो अग्नि उस
यजमान को जला देगी। जब कोई अग्नि में आहुति देता है तो मानो अग्नि के अर्पण करता है।
और ऋत्विज लोग जो आशीर्वाद यजमान को देते हैं अग्नि उन सबका सम्पादन करता है। इस
प्रकार ये अपने वैभव को ही जोड़ते हैं, न कि शरीरों को। इसीलिए कहता है कि 'अपने वैभव
को मिलाओ, न कि शरीरों को' ॥११॥
अध्याय ८—ब्राह्मण १
इस प्रकार चुना जाकर होता, होता के स्थान में बैठता है, बैठकर प्रेरणा करता है और
अध्वर्यु प्रेरित होकर दो स्रुचों को लेता है ॥१॥
अब वे आप्रि मन्त्रों से कार्य करते हैं। आप्रि मन्त्रों से क्यों करते हैं? इसलिए कि जो
दीक्षा लेता है वह अपने सब मन से और सम्पूर्ण आत्मा से यज्ञ की तैयारी करता है। उसका
आत्मा खाली-सा हो जाता है। इन आप्रि मन्त्रों से वे उसको भर-सा देते हैं। और चूंकि वे
इनसे भरते हैं इसलिए इनका नाम आप्रि है ॥२॥
ये ग्यारह प्रयाज होते हैं। इस पुरुष में दस प्राण हैं और ग्यारहवां आत्मा है, जिसमें
ये दसों प्राण स्थापित हैं। इतना सम्पूर्ण पुरुष है। इस प्रकार ये उसको पूर्ण कर देते हैं। इसलिए
ग्यारह प्रयाज होते हैं ॥३॥
(अध्वर्यु) आग्नीध्र में श्रौषट् कहकर (मैत्रावरुण से) कहता है—'समिधाओं के लिए
प्रेरणा कर।' इस प्रकार 'प्रैष्य'-'प्रैष्य' कहकर हर चौथी आहुति में घी को साथ-साथ छोड़ता
हुआ दस प्रयाजों का कार्य करता है। दस प्रयाजों को कहकर कहता है, 'शास (घातक) को
लाओ।' शास नाम है 'असि' या तलवार का ॥४॥
अब वह यूप के टुकड़े को लेता है। और इन दोनों (अर्थात् शास और यूप-शकल) को
जुहू में से घी लगाकर उनसे पशु के ललाट को छूता है—"घृतेनाक्तौ पशूंस्त्रायेथाम्" (यजु०
६।१९)—"घृत से युक्त तुम दोनों पशुओं की रक्षा करो।" यूप-शकल वज्र है। शास वज्र
है। आज्य (घृत) वज्र है। इन सबको मिलाकर वज्र बनाकर उसको उस पशु का रक्षक नियत
करता है जिससे दुष्ट राक्षस उसकी हिंसा न कर सकें। अब यूप के टुकड़े को छिपा देता है और
(घातक के हाथ में) शास को देकर कहता है कि यह प्रज्ञात (स्वीकृत) धार है। और दोनों
स्रुचों को रख देता है ॥५॥
अब (होता से) कहता है कि परि-अग्नि के लिए अनुवाक कह। (इस पर होता ऋग्वेद
४।१५।१-३ को पढ़ता है)। आग्नीध्र आग की लकड़ी को लेकर (पशु के) चारों ओर फिराता
है। वह अग्नि को चारों ओर इसलिए फिराता है कि चारों ओर से छिद्र-रहित परिखा बन जाय
और दुष्ट राक्षस उसको सता न सकें। अग्नि ही राक्षसों का घातक है, इसलिए अग्नि को चारों
ओर फिराता है। जहाँ उसे पकाते हैं वहाँ वह अग्नि को फिराता है ॥६॥
कुछ लोगों का कहना है कि उस लकड़ी को फिर वापस (आहवनीय तक) ले जाना
चाहिए और अन्य अग्नि का मन्थन करके उससे पकाना चाहिए, क्योंकि यह आहवनीय है और
इसमें कच्चे को पकाना ठीक नहीं। यह तो इसलिए है कि पके-पकाये की आहुति दी जाय ॥७॥