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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 479 of 699

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Page 479

कां० ३, अ० ७, ब्रा० १, कं० ६-१४ शतपथब्राह्मण / ४६१
यह जो गड्ढा खोदा गया वह पितरों के लिए था। इसलिए वह उसे पवित्र करता है ॥६॥
अब वह पूर्व की ओर, उत्तर की ओर सिरा करके कुश रखता है, इस मन्त्रांश को पढ़-
कर—"पितृषदनमसि" (यजु० ६।१)—"तू पितरों के रहने का स्थान है।" यह जो गड्ढा खोदा
गया वह पितरों का था। मानो वह वृक्षों की भाँति गाड़ दिया गया; खोदा नहीं गया। इस
प्रकार वह वृक्षों के समान स्थापित हो जाता है। (तात्पर्य यह है कि यूप जब गाड़ दिया गया तो
वृक्षों के समान हो गया) ॥७॥
अब वह यूप-शकल को भीतर डालता है। यह जो बाहरी छाल होती है वह वृक्ष का
तेज होता है। इसलिए यह जो बाहर की छाल को छील देते हैं, मानो उसके तेज को सुखा देते
हैं, क्योंकि यह उनका तेज है। यूप-शकल को भीतर डालने का तात्पर्य यह है कि यूप को तेज
के साथ गाड़ सकूँ। इसी को क्यों डालता है, अन्य को क्यों नहीं? इसका कारण यह है कि इसको
यजुः-मन्त्र पढ़कर शुद्ध किया गया है। इसलिए वह यूप-शकल को डालता है ॥८॥
वह इस मन्त्रांश को पढ़कर डालता है—"अग्रेणीरसि स्वावेशऽउन्नेतॄणाम्" (यजु०
६।२)—"तू अगुआ है। उन्नेताओं के लिए सुगमता से मिलने योग्य।" यह यूप-शकल आगे के
भाग से छीला गया है, इसलिए वह कहता है, 'अग्रेणीरसि' इत्यादि। अब कहता है—"एतस्य
वित्तादधि त्वा स्थास्यति" (यजु० ६।२)—"सावधान हो। यह तुझ पर खड़ा होगा।" वस्तुतः
यह उसी पर खड़ा होगा। इसलिए वह कहता है, 'एतस्य' इत्यादि ॥६॥
अब स्रुवा से घी लेकर गड्ढे में आहुति देते हैं कि कहीं दुष्ट राक्षस उसको न सतावें।
घी वज्र होता है। इस प्रकार वह वज्र से दुष्ट राक्षसों को भगाता है। इस प्रकार दुष्ट राक्षस
नीचे से नहीं उठते। अब वह परिक्रमा करके आगे की ओर उत्तराभिमुख बैठता है और यूप पर
घी लगाता है। अब वह होता से कहता है, 'घी-युक्त यूप के लिए मन्त्र पढ़' ॥१०॥
वह इस मन्त्रांश से घी लगाता है—"देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु" (यजु० ६।२)—
"सविता देव तुझको मधु से युक्त करे।" सविता देवों का प्रेरक है, और यह यूप यजमान ही है।
और यहाँ की ये सब चीजें मधु हैं। इस सबके साथ इस प्रकार से इसको सम्बन्धित करता है,
और प्रेरक सविता प्रेरणा करता है। इसलिए कहता है, 'देवस्त्वा सविता' इत्यादि ॥११॥
अब वह चषाल को दोनों ओर से घी लाकर यूप के ऊपर रखता है यह पढ़कर—
“सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः" (यजु० ६।२)- "अच्छे फलों-युक्त ओषधियों के लिए।" क्योंकि यह
(चषाल) उसका फल ही है यह जो बीच में सकुड़ा होता है। इसका कारण यह है कि वृक्ष पर
फल दोनों ओर से जुड़ा होता है और डंठल और फल के बीच का भाग सकुड़ा होता है।
इसलिए बीच में सुकड़ा होता है ॥१२॥
जो आग के सामने का भाग है उसमें ऊपर से नीचे तक घी लगाता है। क्योंकि आग के
सामने का भाग यजमान होता है और घी रस है। रस से वह यजमान को युक्त करता है।
इसलिए वह आग के सामने के भाग पर ऊपर से नीचे तक घी लगाता है। अब वह यूप की पिंडी
को उठाता है, यह कहकर, 'यूप के गाड़ने के लिए मन्त्र पढ़' ॥१३॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर उठाता है—"द्यामग्रेणास्पृक्षोऽन्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवी-
मुपरेणादृ ँहीः।" (यजु० ६।२)-"तूने अग्र भाग से द्यौलोक को छुआ, बीच के से अन्तरिक्ष को,
पैरों से तूने पृथिवी को सुदृढ़ कर दिया" ॥१४॥