शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकाँ० ३, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० २१ व १-११ शतपथब्राह्मण / ४५५
नहीं खाते क्योंकि जब तक आहुति न पड़ जाय, हवि का भाग न खाना चाहिए। इसलिए दीक्षित
का अन्न नहीं खाना चाहिए। अब वह अँगुलियों को ढीला कर लेता है ॥२१॥
अध्याय ६-ब्राह्मण ४
यूप को काटते हुए विष्णु-सम्बन्धी ऋचा से आहुति देता है। यूप विष्णु का है। इसलिए
विष्णु की ऋचा से आहुति देता है ॥१॥
वह विष्णु की ऋचा से क्यों आहुति देता है ? यज्ञ ही विष्णु है। इस प्रकार यज्ञ के द्वारा
ही यूप तक पहुँचता है। इसलिए विष्णु की ऋचा से आहुति देता है ॥२॥
यदि स्रुच् से आहुति देता है तो चार चमचे की लेकर आहुति देता है। और यदि स्रुवा
से आहुति देता है तो स्रुवा से ही घी में से थोड़ा भाग लेकर आहुति देता है, इस मन्त्र से—
“ऊरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षया॑य॒ नस्कृधि। घृतं घृतयोने पिब प्रप्र य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑” (यजु०
५।४१)—“हे यज्ञ ! तुम फूलो-फलो। तुम हमारे लिए विस्तृत घर बनाओ। हे घृत के घर, घृत
पियो और यजमान को तारो” ॥३॥
जो घी बच रहता है उसे ले लेता है। जो औजार बढ़ई का है उसे बढ़ई ले लेता है। अब
वे चलते हैं। और जो लकड़ी यूप के लिए निश्चित की जाती है—॥४॥
उसको इस मन्त्र का जाप करते हुए छूते हैं। ये पीछे खड़े होकर और पूर्व की ओर मुँह
करके उसको नमस्कार करते हैं—‘‘अत्य॒न्वाँ२ऽ अगां नाभ्याँ२ऽ उपागाम् (यजु० ५।४२)—‘‘मैं
दूसरों को छोड़ आया। मैं दूसरों के पास तक नहीं गया।” वस्तुतः वह दूसरों को छोड़ जाता है
और उनके पास तक नहीं जाता। इसलिए वह कहता है कि ‘अत्यन्वां’ इत्यादि ॥५॥
“अर्वा॑क् त्वा परे᳭भ्योऽविदं परो᳭ऽवरेभ्यः” (यजु० ५।४२)—“तुझको मैंने दूर चीजों से
निकट और निकटों से दूर पाया।” वस्तुतः जब वह इसको काटकर गिराता है तो जो दूर हैं
उनकी अपेक्षा निकट गिराता है और जो निकट हैं उनकी अपेक्षा दूर गिराता है। इसलिए कहता
है ‘अर्वाक् त्वा’ इत्यादि ॥६॥
“तं त्वा जुषामहे देव॒ वनस्पते देव॒यज्या॑यै” (यजु० ५।४२)—‘‘हे वनस्पते, देवों के यज्ञ के
लिए हम तुझको पसन्द करते हैं।” जैसे किन्हीं अच्छे कार्यों के लिए कई पदार्थों में से एक को
छाँट लेते हैं और वह छँटा हुआ पदार्थ उत्तमता से उस कार्य को सम्पादित करता है, इसी प्रकार
इस वृक्ष को कई वृक्षों में से शुभ-कर्म के लिए छाँटते हैं, और यह वृक्ष काटने के लिए उपयुक्त
होता है ॥७॥
“दे॒वास्त्वा देवय॒ज्यायै॑ जुषन्ताम्” (यजु० ५।४२)—“तुझको देव देवताओं के यज्ञ के लिए
पसन्द करें।” जिसको देवतागण किसी साधु कर्म के लिए पसन्द कर लेते हैं वह अवश्य ही सफल
होता है, इसलिए कहा ‘देवास्त्वा’ इत्यादि ॥८॥
अब वह स्रुवा से उसको छूता है—‘‘विष्णवे त्वा” (यजु० ५।४२)—“विष्णु के लिए
तुझको।” विष्णु का यूप है। विष्णु यज्ञ है। यज्ञ के लिए ही उसको काटता है, इसलिए कहता है
‘विष्णवे’ ॥६॥
अब वह बीच में एक दर्भ रख देता है—‘‘ओषधे॒ त्राय॑स्व” (यजु० ५।४२)—‘‘हे ओषधे,
तू बचा।” परशु वज्र है। इस प्रकार वह वज्र परशु उसको हानि नहीं पहुँचाता। अब परशु से
मारता है “स्वधि॑ते॒ मैनं॒ हि॑ सीः” (यजु० ५।४२)—‘‘हे परशु, इसको न मार।” परशु वज्र है।
परन्तु वह परशु वज्र इस प्रकार उसे हानि नहीं पहुँचाता ॥१०॥
पहली चीपुटी जो काटता है उसे अलग रख देता है। उसको इस प्रकार काटना चाहिए