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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 471 of 699

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Page 471

कां० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १५-२१ शतपथब्राह्मण / ४५३
पिंब प्रप्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑” (यजु० ५।३८)—“हे विष्णु, फैल-फूटकर कदम भर। हमारे घर
के लिए फैल-फूटकर स्थान दे। तू घृत की योनि है, घृत पी और यज्ञपति को आगे बढ़ा।” इस
प्रकार वह द्यौलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है और इस आहुति को देकर द्यौलोक की प्राप्ति
कर लेता है ॥१५॥
विष्णु-सम्बन्धी मन्त्र से आहुति देने का अर्थ यह है कि इस प्रकार उन्होंने (सोम को)
इतना सूक्ष्म कर लिया कि आक्रमणों से बच सके और बूंद के रूप में ले गये, क्योंकि बूंद अप्तु
अर्थात् तीव्रगामी होता है। रक्षा करने के बाद उसको यज्ञ-सम्बन्धी बनाता है क्योंकि विष्णु ही
यज्ञ है। इसलिए वह विष्णु के मन्त्र से आहुति देता है ॥१६॥
स्रुचों को रखकर और जल को स्पर्श करके सोम राजा का (हविर्धान में) प्रवेश कराते
हैं। स्रुचों को रखकर और जल को स्पर्श करके सोम राजा को हविर्धान में क्यों ले जाते हैं ?
इसलिए कि घी वज्र है और सोम रेत या वीर्य है। वह स्रुचों को रखकर और जल को स्पर्श
करके सोम राजा को इसलिए ले जाते हैं कि कहीं सोम-वीर्य और घी-वज्र को हानि न पहुँच
जाय ॥१७॥
दक्षिणी हविर्धान के नीड में मृगचर्म बिछाता है और उसपर सोम को बिठाल देता है,
इस मन्त्र से—“दे॒व स॑वितरे॒ष ते॒ सोम॒स्तँ॒ रक्ष॑स्व॒ मा त्वा॑ दभन्” (यजु० ५।३९)—“हे सविता
देव, यह तेरा सोम है। तू इसकी रक्षा कर। कोई तुझको हानि न पहुँचावे।” इस प्रकार वह
रक्षा के हेतु सोम को सविता के हवाले कर देता है ॥१८॥
उसको हाथ से छोड़कर उसकी उपासना करता है—“ए॒तत्त्वं दे॑व सोम दे॒वो दे॒वाँ२
ऽउपागा॑ऽइ॒दम॒हं म॑नु॒ष्यान्त्स॒ह रा॒यस्पोषेण॑” (यजु० ५।३९)—“हे देव सोम, तू देव होकर दूसरे
देवों से मिला और मैं धन की वृद्धि के लिए मनुष्यों से मिला।” जो दीक्षा लेता है उसको अग्नि-
सोम अपने जबड़ों के बीच में लेते हैं। वह दीक्षा की आहुति अग्नि और विष्णु की होती है। जो
विष्णु है वह सोम ही है। जो दीक्षा लेता है वह देवताओं की हवि होता है। इस प्रकार उन्होंने
उसको अपने जबड़ों के बीच दाब लिया। यह जो 'एतत् त्वं देव सोम' आदि मन्त्र पढ़ा, मानो
वह इससे सोम से मुक्त होगा। 'रायस्पोषः' का अर्थ है चीजों का बाहुल्य। 'रायस्पोषेण' का
तात्पर्य है 'बाहुल्य के साथ' ॥१९॥
अब वह यह मन्त्रांश पढ़कर हविर्धान से निकल आता है—“स्वाहा॒ निर्वरु॑णस्य॒ पाशा॒न्
मुच्ये” (यजु० ५।३६)—“मैं वरुण के फंदों से छूटता हूँ।” जो दूसरे के मुंह में है वह मानो
वरुण के फंदे में है। इसलिए जब वह कहता है 'स्वाहा निर्वरुणस्य' इति, तब मानो वह वरुण के
फंदे से छूटता है ॥२०॥
अब इस प्रकार आहवनीय में समिधा को रखता है—“अग्ने॒ व्रत॑पास्त्वे व्र॒तपाः” (यजु०
५।४०)—“हे व्रत के पालनेवाले अग्नि, तुझ पर, हे व्रत के पालनेवाले।” अग्नि देवों का व्रत-
पति है। इसलिए कहा 'अग्ने व्रतपाः' आदि। अब कहता है—“या तव॑ तनूर्मय्यभूदे॒षा सा त्वयि॒
यो मम॑ तनू॒स्त्वय्यभूदि॒यँ॒ सा मयि॑ । यथा॒यथं नौ व्रतपते व्र॒तान्यनु॑ मे दीक्षां दी॒क्षाप॑तिरमँ॒स्तानु॒
तप॒स्तप॑स्पतिः” (यजु० ५।४०)—“जो तेरी सत्ता मुझमें थी वह तुझमें हो। जो मेरी सत्ता
तुझमें थी वह मुझमें हो। हे व्रतपते, हम दोनों के व्रत ठीक-ठीक हो गये। दीक्षा के पति ने मेरी
दीक्षा स्वीकार कर ली। तप के पति ने मेरा तप स्वीकार कर लिया।” इस प्रकार वह अग्नि
से मुक्त हो जाता है और अपनी ही सत्ता से यज्ञ करता है। अब वे उसका अन्न खाते हैं क्योंकि
अब वह मनुष्य है। अब वे उसका नाम लेते हैं क्योंकि अब वह मनुष्य है। पहले वे इसका अन्न