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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० १, अ० २, ब्रा० २, कं० ४-१५ शतपथब्राह्मण / २६
घी को ॥४॥
ये दोनों काम साथ-साथ किये जाते हैं। ये दोनों काम साथ क्यों किये जाते हैं ? इसलिए
कि यज्ञ के आत्मा का आधा भाग घी है और आधा हवि । वे दोनों सींचते हैं कि आधा भाग यह
हुआ और आधा भाग यह हुआ । इन दोनों को साथ-साथ अग्नि में ले जावे । इसलिये इन दोनों
कामों को साथ-साथ करते हैं जिससे यज्ञों का आत्मा पूरा-पूरा जुड़ जाय ॥५॥
अग्नीध्र घी को आग पर यह मन्त्रांश पढ़कर पकाता है (यजु० १।२२) —"रस के लिए
तुझको।" रस से तात्पर्य है वृष्टि का । फिर उसको आग पर से हटा लेता है और कहता है—
“ऊर्ज के लिए तुझको” (यजु० १।३०) । वर्षा से यह ऊर्ज (वृक्षों में) उत्पन्न होता है, उसी से
तात्पर्य है ॥६॥
अब (अध्वर्यु) पुरोडाश को पकाता है यह पढ़कर—"तू घर्म है" (यजु० १।२२) । इस
प्रकार उसको 'यज्ञ' बना देता है, यानी उसको कड़ाही में पकाया। अब कहता है—"विश्वायुः।"
इससे वह यजमान के लिए जीवन की वृद्धि करता है ॥७॥
अब वह उसको (कपालों) में फैलाता है (यजु० १।२२) को पढ़कर—"तू फैला हुआ है।
फैल जा । तेरा यज्ञपति भी ऐसा ही फैले ।” यज्ञपति यजमान है। यह यजमान के लिए आशीर्वाद
है ॥८॥
उसको बहुत नहीं फैलाना चाहिए। बहुत फैलाने से वह मानुषी हो जाती है (दैवी नहीं
रहती) । मानुषी हवि अशुभ होती है। वह चाहता है कि कोई ऐसा काम न हो कि अशुभ हो
जाय, इसलिये बहुत नहीं फैलाता ॥६॥
कुछ का कहना है कि घोड़े की टाप के बराबर होना चाहिए। परन्तु कौन जाने कि घोड़े
की टाप कितनी चौड़ी होती है ? अतः इतना चौड़ा करना चाहिए कि बुद्धि कहे कि बहुत चौड़ी
नहीं है ॥१०॥
अब जल से स्पर्श कराता है। एक बार या तीन बार ? क्योंकि फटकने या पीसने में जो
कुछ उसको क्षति हो गई हो, जल से दूर हो जाती हैं। जल शान्ति है। जल से उसका शमन कर
देता है। इसीलिए जल स्पर्श कराता है ॥११॥
वह जल का स्पर्श इस मन्त्रांश (यजु० १।२२) से कराता है—"अग्नि तेरी त्वचा को हानि
न पहुँचावे ।” अग्नि पर उसे तपाना है। इसीलिये कहता है कि 'अग्नि तेरी त्वचा को हानि न
पहुँचावे' ॥१२॥
अब उसके चारों ओर अग्नि की परिक्रमा कराता है। मानो उसके चारों ओर एक छिद्र-
रहित परिखा बनाता है जिससे राक्षस उसको ग्रहण न कर सकें। क्योंकि अग्नि राक्षसों का दूर
करनेवाला है, इसीलिये अग्नि को परिखा बनाता है ॥१३॥
अब उसे पकाता है, यजु० १।२२ के इस मन्त्रांश को पढ़कर—'देव सविता तुझे पकावें।'
इसका पकानेवाला मनुष्य नहीं हैं, देव हैं। इसलिये 'देव सविता पकावें' ऐसा कहता है। अब
कहता है “स्वर्ग में”, अर्थात् 'देवों के स्थान में'। अब यह कहकर छूता है—"देखूं पका कि नहीं।"
इसीलिये छूता है ॥१४॥
वह इस मन्त्रांश को पढ़कर छूता है—"मत डर ! मत संकोच कर !" यह कहने का
तात्पर्य यह है कि 'डर मत, संकोच न कर, मैं मनुष्य हूँ और तू अमानुष अर्थात् देव है । मैं तुझे