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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 465 of 699

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Page 465

का० ३, अ० ६, ब्रा० २, क० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ४४७
में हम उसके रक्षक रहे उसी प्रकार इस भूमि पर भी रक्षक रहेंगे' ॥१८॥
देवों ने कहा—'अच्छा।' जब वह कहता है—'यह है सोम की मजदूरी।' तो इससे सोम
के मोल से तात्पर्य है। फिर उन्होंने कहा—'तीसरे सवन में जो घी की आहुति दी जायगी वह
तुम्हारी होगी। सोम का पान तुमसे छीन लिया गया है। इसलिए तुम सोम की आहुति के
अधिकारी नहीं रहे। इसलिए सायंकाल के तीसरे सवन में कुण्ड में लकड़ियों पर जो घी की
आहुति दी जाती है वही इनकी होती है, सोम की आहुति नहीं ॥१९॥
'और जो आहुति घी में दी जायगी वह तुमको तृप्त कर देगी।' इसलिए जो घी में
आहुति दी जाती है वह उनको तृप्त कर देती है। 'और वह जो सोम को चमचों के लिए ऊपर-
ऊपर फिरायेंगे उनसे इसकी तृप्ति होगी।' इसलिए यह जो सोम को चमचे में भरकर ऊपर-ऊपर
फिराते हैं उनसे इसकी तृप्ति होती है। इसलिए अध्वर्यु को चाहिए कि कुण्डों के बीच से न गुजरे
क्योंकि वह सोम के लिए होता है और वे (कुण्ड) सोम के लिए मुँह खोले बैठे होते हैं, और
वह उनके मुँह में घुस जायेगा। इसलिये या तो उसको अग्नि जला देगा या जो देव पशुओं का
अधिष्ठाता है (पशुपति, रुद्र) वह उसको पकड़ लेगा। इसलिये जब कभी अध्वर्यु का शाला में
कुछ काम हो तो वह आग्नीध्रीय अग्नि के उत्तर की ओर होकर जावे ॥२०॥
ये कुण्ड सोम की रक्षा के लिए बनाये जाते हैं—आगे आहवनीय, दाईं ओर मार्जालीय,
बाईं ओर आग्नीध्रीय और पीछे की ओर सदस् ॥२१॥
इनमें से आधे को मिट्टी डालकर ऊँचा करते हैं और आधे की ओर केवल संकेत करते
हैं। उन्हीं का यह आग्रह था कि हममें से आधों को ऊँचा करो, आधों की ओर संकेत करो।
(यहाँ 'अनुदिशन्तु' का अर्थ समझ में नहीं आया) इस प्रकार हम उस द्युलोक को जान लेंगे
जहाँ से हम आये हैं, और हम बहक न सकेंगे ॥२२॥
जो ऊँचे किये गये वे इस लोक में प्रत्यक्ष होते हैं, और जिनकी ओर संकेत करते हैं वे
उस लोक में प्रत्यक्ष होते हैं ॥२३॥
उनके दो नाम होते हैं। वस्तुतः यह उन्हीं का आग्रह था कि 'हम इन नामों से फलीभूत
नहीं हुए क्योंकि हमसे सोम ले लिया गया। अब हम दूसरे नाम रख लें।' उन्होंने दूसरा नाम
रख लिया। इससे वे सफल हो गये, क्योंकि जो सोम से वंचित हो चुके थे उनको यज्ञ में भाग
मिल गया। इसलिये दो नाम होते हैं। इसलिए यदि कोई ब्राह्मण सफल न होता हो तो दूसरा
नाम रख ले। जो इस रहस्य को समझकर दूसरा नाम रख लेता है वह फलीभूत हो जाता
है ॥२४॥
वह अग्नि में जो आहुतियां देता है वह देवों के प्रति देता है। इसी से देव स्थित रहते
हैं। और जो सदस् में खाते हैं वे मनुष्यों के प्रति देते हैं। उससे मनुष्यों की स्थिति है। हविर्धानों
में जो नाराशंस बैठते हैं वे पितरों के प्रति होते हैं। उनसे पितरों की स्थिति है ॥२५॥
अब जो ऐसी प्रजा बच रही जिसका यज्ञ में कोई भाग ही नहीं है, वह तो कहीं की नहीं