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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 463 of 699

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Page 463

कां० ३, अ० ६, ब्रा० २, कं० ६-१८ शतपथब्राह्मण / ४४५
कद्रू ने कहा-'तुम्हीं जाओ और बता देना कि हममें से किसकी विजय हुई' ॥६॥
सुपर्णी वहाँ तक उड़ी और कद्रू ने जो कहा था वही ठीक निकला । जब वह वापस आई
तो कद्रू ने उससे पूछा- 'तुम जीतीं या मैं ?' उसने कहा 'तुम ।' इसको 'सौपर्णी-काद्रव
व्याख्यान कहते हैं ॥७॥ [शतम् १६००]
तब कद्रू ने कहा- 'सचमुच मैंने तुमको जीत लिया । द्यौलोक में सोम है, उसको देवों के
लिए ले आओ। और देवों के ऋण से मुक्त हो ।' यथास्तु । वह छन्दों को लाई । वह गायत्री
द्यौलोक से सोम को ले आई ॥८॥
वह (सोम) दो सोने के प्यालों के बीच में था। आँख मारते में ही वे प्याले तेज किनारो
द्वारा बन्द हो जाते थे। ये थे दीक्षा और तप । उन पर सोमरक्षक गन्धर्व देखभाल रखते थे। यही
धिष्ण्यां हैं, यही होता ॥९॥
उसने इनमें से एक प्याले को खोला और देवों को दे दिया। यह दीक्षा थी। इसी से देवों
ने अपने को दीक्षित किया ॥१०॥
अब उसने दूसरे प्याले को खोला और देवों को दिया। यही 'तप' था। इससे देवों ने
तप किया अर्थात् उपसद, क्योंकि उपसद ही तप है ॥११॥
उसने खदिर की लकड़ी से सोम को लिया (आच्छखाद), इसलिए उनका खदिर नाम
पड़ा । और चूँकि उसी के द्वारा उसने सोम को लिया, इसलिए यूप और स्फ्या खदिर की लकड़ी
के होते हैं। जब वह अच्छावाक के सुपुर्द था तब वह उसे ले गई । इसीलिए 'अच्छावाक' को सोम-
पान का अधिकार नहीं ॥१२॥
इन्द्र और अग्नि ने प्रजाओं की उत्पत्ति के लिए उसको स्थित रक्खा, इसलिए अच्छावाक्
इन्द्र और अग्नि का होता है ॥१३॥
इसीलिए दीक्षित पुरुष ही सोम राजा की रक्षा करते हैं कि गन्धर्व कहीं इसको ले न
जायें। इसलिए उचित है कि उसकी भलीभांति रक्षा की जाय। क्योंकि जिस किसी की सुपुर्दगी
में से वे सोम को ले-जायेंगे, वही (सोमपान से) बहिष्कृत कर दिया जायगा ॥१४॥
इसीलिए ब्रह्मचारी लोग अपने आचार्य, उसके घर तथा पशुओं की रक्षा करते हैं कि
कहीं वे उसको ले न जायें। इसलिए उस (सोम) की बड़ी रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि जिस
किसी की सुपुर्दगी में से वे ले जायेंगे उसी को (सोमपान से) बहिष्कृत कर दिया जायगा ।
इसी के द्वारा सुपर्णी ने देवों के ऋण से छुटकारा पाया, इसलिए कहते हैं कि यज्ञ करनेवाले पुण्य-
लोक को प्राप्त होते हैं ॥१५॥
पुरुष जब पैदा होता है तभी मृत्यु का ऋणी होता है। और जब वह यज्ञ करता है तो
मृत्यु के ऋण से छूटता है, जैसे सुपर्णी देवताओं के ऋण से छूट गई ॥१६॥
देवों ने (सोम के साथ) यज्ञ किया । सोमरक्षक गन्धर्वों ने उसका अनुसरण किया और
आकर कहने लगे- 'हमको यज्ञ में भाग दो। हमको यज्ञ से बाहर मत करो। यज्ञ में हमारा भी
भाग होना चाहिए' ॥१७॥
उन्होंने कहा-'हमको इससे क्या लाभ होगा ?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'जैसे उस लोक