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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 461

का० ३, अ० ६, ब्रा० १-२, कं० २७-२६ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४४३
राक्षसों ने दक्षिण से आक्रमण किया और सदस् से निकाल दिया, और सदस् के भीतर जो
'धिष्ण्यः' (कुण्ड) थे उनको उलट दिया ॥२७॥
पहले ये सब कुण्ड ऐसे ही जलते थे जैसे यह आहवनीय या गार्हपत्य या आग्नीध्रीय ।
जब से उन्होंने इनको उलट दिया तब से ये नहीं जलते । उन (राक्षसों) ने (देवों को) आग्नी-
ध्रीय अग्नि तक रोक दिया । उनसे आग्नीध्रीय अग्नि का आधा भाग जीत भी लिया। वहीं से
देवों ने अमरपन को प्राप्त किया। इसलिए 'आग्नीध्रीय अग्नि' सब देवों की हो गई ॥२८॥
देवों ने उनको फिर जला लिया, क्योंकि उनका वहाँ रहना था। इसलिए प्रत्येक सोम-
याग में इनको जलाया जाता है। इसलिए जो समृद्ध (पूर्ण योग्य) हो वही आग्नीध्र का काम
करे । समृद्ध वह होता है जो ज्ञानी और वेदपाठी हो। पहले आग्नीध्र के पास दक्षिणा ले जाते
हैं। सब देवों ने यहीं अमरत्व की प्राप्ति की थी। अगर दीक्षित लोगों में किसी प्रकार की निर्बलता
(अबल्य) आ जाय तो अध्वर्यु कहे— 'इसको आग्नीध्र के पास ले जाओ।' चूंकि वह अनार्त या
दुःखरहित है इसलिए उसको भी वहाँ दुःख न होगा। चूंकि यहाँ सब देवों को अमरत्व प्राप्त हुआ
इसलिए यह 'सब देवों का' है ॥२६॥
अध्याय ६—ब्राह्मण २
धिष्ण्याँ (कुण्ड) यजमान के विजामान होते हैं, क्योंकि ये समङ्क होते हैं। जो समङ्क
हों उनको विजामान कहते हैं । (समङ्क या विजामान वे वस्तुएं होती हैं जिनके अङ्ग एक-दूसरे
के अनुकूल होते हैं, जैसे यदि मनुष्य के सिर है तो धिष्णी का भी सिर है। यदि मनुष्य के आँख है
तो धिष्णी की भी आँख है। अर्थात् एक-एक अङ्ग के स्थान में दूसरा अङ्ग होना)। उसके धड़
के अङ्ग ये हैं—॥१॥
सोम द्यौलोक में था और देव इस लोक में। देवों ने कामना की कि सोम हमारे पास आ
जावे और उस आये हुए सोम के साथ हम यज्ञ करें। उन्होंने दो माया बनाईं-सुपर्णी और कद्रू।
सुपर्णी वाणी थी और कद्रू यह भूमि । उन्होंने उनके बीच में झगड़ा करा दिया ॥२॥
तब वे झगड़ने लगीं, 'जो हममें से सबसे दूर की चीज देख लेगी वही दूसरी पर विजय
पायेगी।' कद्रू ने कहा, 'अच्छा, देख' ॥३॥
सुपर्णी ने कहा—'इस सलिल के उस पार एक श्वेत घोड़ा एक खम्भे के पास खड़ा है।
मैं उसे देख रही हूँ। क्या तू भी उसको देखती है ?' कद्रू ने कहा—'मैं देखती हूँ । उसकी पूंछ
अभी लटक रही थी। मैं देखती हूँ कि वायु इस समय उसको हिला रही है' ॥४॥
अब जब सुपर्णी ने कहा—'उस सलिल के उस पार' तो सलिल का अर्थ था वेदी ।
उससे उसका तात्पर्य वेदी से था। 'खम्भे के पास एक सफेद घोड़ा खड़ा है।' श्वेत घोड़े से तात्पर्य
यज्ञ का है और खम्भे से यज्ञ-यूप का। कद्रू ने जो कहा था कि 'इसकी पूंछ अभी लटक रही थी,
अब उसको वायु हिला रहा है। मैं उसे देख रही हूँ' यह केवल रस्सी थी ॥५॥
तब सुपर्णी ने कहा— 'चलो वहाँ तक उड़ चलें और देखें कि हममें से किसकी जीत हुई ।'