शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ३, अ० ५-६, ब्रा० ४-१, कं० २३-२४ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४३७
है, क्योंकि यह विष्णु की जिह्वा है। वह बिल्कुल लाल इसलिए रंगा जाता है कि जीभ का रंग
लाल होता है। यह पढ़कर नीचे रख देता है—'वैष्णवमसि' (यजु० ५।२५)। 'तू विष्णु की है।'
यह विष्णु का तो है ही ॥२३॥
अब सोम निचोड़ने के पत्थर लाता है (पाँच पत्थर)। ये पत्थर विष्णु के दाँतों के तुल्य
हैं। इसलिए जब सोम को पीसते हैं तो मानो दाँतों से पीसते हैं। यह कहकर रख देता है—'वैष्णवा
स्थ' (यजु० ५।२५) —"विष्णु के होकर रहो।" क्योंकि विष्णु के तो हैं ही। अब यज्ञ का सिर पूरा
हो गया ॥२४॥
अध्याय ६—ब्राह्मण १
सदस् इस यज्ञ का पेट है। इसलिए सदस् में ही खाते हैं। क्योंकि इस संसार में जो कुछ
ख या जाता है वह पेट में ही रक्खा जाता है। इसको सदस् इसलिए कहते हैं कि इसमें सब देव
बैठे (असीदन्)। इसी प्रकार सब गोत्रों के ब्राह्मण इसी में बैठते हैं। इसका देवता इन्द्र है ॥१॥
इसके मध्य में वह उदुम्बर की लकड़ी रखता है। उदुम्बर अन्न या शक्ति है। सदस् इस
यज्ञ का पेट है। इसलिए उस पेट के बीच में वह उदुम्बर की लकड़ी रखता है ॥२॥
वेदी के पिछले आधे भाग के बीच में जो खूंटी होती है उससे पूर्व की ओर छः पग चलता
है। इससे हटकर दाहिनी ओर सातवाँ पग भरता है, कामना की पूर्ति के लिए। वहाँ एक गड्ढे
का चिह्न बना देता है ॥३॥
इस मन्त्र को पढ़कर खुरपी (अभ्रि) लेता है— "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां
पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि" (यजु० ५।२२)—"सविता देव की प्रेरणा पर अश्विनी की भुजाओं
और पूषा के हाथों से मैं तुझको लेता हूँ। तू नारी है।" इस यजुः का भी यही तात्पर्य है जो पहले
बता दिया गया। खुरपी (अभ्रि) तो स्त्रीलिङ्ग है ही। इसलिए वह उसको कहता है कि 'तू
नारी है' ॥४॥
अब वह इस मन्त्रांश से गड्ढे का चिह्न बनाता है— "इदमहँ रक्षसां ग्रीवाऽअपि-
कृन्तामि" (यजु० ५।२२)—"मैं इससे राक्षसों की गर्दन काटता हूँ।" यह खुरपी वज्र है। वज्र से
ही दुष्ट राक्षसों की गर्दन काटता है ॥५॥
अब खोदता है। मिट्टी पूर्व को डालता है। यजमान के कद के बराबर नापकर उदुम्बर
की लकड़ी को चारों ओर से चिकनाता है और गड्ढे के आगे इस प्रकार रखता है कि उसका
अग्रभाग पूर्व की ओर रहे। उतने ही बड़े कुशों को उसके ऊपर रखता है ॥६॥
अब प्रोक्षणी के जलों में जौ (यव) होते हैं। ओषधियों का रस जल है। इसलिए यदि
ओषधियाँ ही खाई जायें तो तृप्ति नहीं करतीं। जलों का रस ओषधियाँ हैं, इसलिए केवल जल
ही पिया जाय तो तृप्ति नहीं होती। जब दोनों मिल जाते हैं तो तृप्ति करते हैं, क्योंकि तब वे
रसवाले हो जाते हैं। वह सोचता है कि सरस जल का सिंचन करूँ ॥७॥
प्रजापति की सन्तान देव और असुरों में झगड़ा हुआ। देवों से सब ओषधियां चली गईं।
केवल जौ (यव) नहीं गये ॥८॥
अब देव जीत गये। जौ ने शत्रुओं की सब ओषधियों को खींच लिया (अयुवत्) ।