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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 453 of 699

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Page 453

का० ३, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १२-२३ शतपथब्राह्मण / ४३५
टोने को या तो अपने सम्बन्धी ने गाड़ा या किसी गैर ने, उस सबको खोदकर फेंकता है ॥१२॥
"इदमहं तं वलगमुत्किरामि यं मे सजातो यमसजातो निचखान' (यजु० ५।२३) - "मैं
इस-उस टोने को खोदकर फेंकता हूँ जो मेरे देशवाले या अन्यदेशवाले ने गाड़ा हो।" टोने को या
तो अपने देशवाले (सजात) ने या दूसरे देशवाले (असजात) ने गाड़ा होगा, उसी को उखाड़-
कर फेंकता है। "उत्कृत्यां किरामि" (यजु० ५।२३) - "कृत्या (जादू) को उखाड़कर फेंकता
हूँ।" जो सूराखों में मिट्टी बची हो उसको निकालकर फेंक देता है ॥१३॥
उन गड्ढों को हाथ-भर गहरा खोदना चाहिए। यहीं तक अन्त हैं (अर्थात् जहाँ तक
पहुँचे वहीं तक खोदे)। इस प्रकार वह जादू-टोने (कृत्या) को नष्ट करता है। इन गड्ढों को
भीतर-भीतर आड़े मार्गों से मिला दे। यदि आड़े मार्ग न बना सके तो सीधे से ही। इसीलिए
(मनुष्य के) प्राण भी एक-दूसरे से भीतरी नालियों द्वारा मिले रहते हैं ॥१४॥
जैसे खोदे गये हैं उस क्रम से यजमान को छुआता है, यह मन्त्र पढ़कर- "स्वराडसि
सपत्नहा सत्राराडस्यभिमातिहा जनराडसि रक्षोहा सर्वराडस्य मित्रहा" (यजु० ५।२४) - "तू
शत्रु का मारनेवाला स्वराट् है। अभिमानियों का मारनेवाला तू सत्रराट् (सततं राजति) अर्थात्
सदा चमकनेवाला है। राक्षसों का मारनेवाला तू मनुष्य का राजा है। शत्रु का मारनेवाला तू
सर्वराट् है।" यह उस काम का आशीर्वाद है। वह इस प्रकार आशीर्वाद प्राप्त करता है ॥१५॥
अध्वर्यु और यजमान (गड्ढों में हाथ डालकर नीचे से) एक-दूसरे को छूते हैं- सामने
के दक्षिण गड्ढे में अध्वर्यु और पिछले बायें गड्ढे में यजमान् । अब अध्वर्यु पूछता है 'यजमान,
यहाँ क्या है ?' वह उत्तर देता है, 'भद्र (कल्याण) है।' अध्वर्यु कहता है, 'यह (भद्र) हम दोनों
के लिए हो' ॥१६॥
अब पिछले दक्षिणी गड्ढे में अध्वर्यु होता है और पिछले उत्तर में यजमान। यजमान
पूछता है, 'अध्वर्यु, यह क्या है ?' अध्वर्यु कहता है 'भद्र ।' यजमान कहता है, 'मेरे लिए भी वही
हो।' वे इस प्रकार इसलिए छूते हैं कि प्राणों को जोड़ देते हैं। इसीलिए प्राण बहुत दूर भीतर
मिले होते हैं । जब पूछने पर वह 'भद्र' कहता है तो तात्पर्य है कि मनुष्य की भाषा में वह
'कल्याण' कहता है। इसीलिए पूछने पर कहता है 'भद्र।' अब उन गड्ढों को जल से सींचता
है। जल-सिंचन का एकमात्र प्रयोजन यही है कि उनको पवित्र करता है ॥१७॥
वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है - "रक्षोहणो वो वलगहनः" (यजु० ५।२५)-
"तुम राक्षसों और जादू-टोने के नष्ट करनेवाले हो।" यह राक्षसों को नष्ट करनेवाले और
जादू-टोने को नष्ट करनेवाले हैं। "प्रोक्षामि वैष्णवान्" (यजु० ५।२५) - 'विष्णु के इनको
सींचता हूँ।" यह विष्णु के तो हैं ही ॥१८॥
अब जो जल बच रहता है उसे गड्ढों में ही डाल देता है। मानो प्राणों में जो जल है
उसको वह डालता है। इसलिए इन प्राणों के इन जलों को - ॥१९॥
यह मन्त्र पढ़कर बाहर फेंकता है- "रक्षोहणो वो वलगहनोऽवनयामि वैष्णवान्"
(यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू के नाश करनेवाले तुम वैष्णवों को मैं बाहर फेंकता हूँ।"
अब वह कुश बिछाता है। कुछ की नोक पूर्व की ओर, कुछ की उत्तर की ओर हो। प्राणों में जो
लोम होते हैं उनको धारण करता है। इसलिए इन प्राणों में लोमों को- ॥२०॥
वह फैला देता है यह मन्त्रांश पढ़कर - "रक्षोहणो वो वलगहनोऽवस्तृणामि वैष्णवान्"
(यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू-टोने के नष्ट करनेवाले तुम वैष्णवों को फैलाता हूँ।" अब
वह कुश फैलाता है, मानो शरीर को ऊपर से ढकता है। क्योंकि कुश (विष्णु के) बाल हैं ॥२१॥
अब सोम निचोड़ने के दो तख्ते रखता है, यह मन्त्रांश पढ़कर - "रक्षोहणौ वां वलगहना-
ऽउपद्धामि वैष्णवी" (यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू को नष्ट करनेवाले दो को मैं रखता
हूँ। तुम विष्णु के हो।" वस्तुतः वे विष्णु के जबड़े हैं। वह उनको मिट्टी से ढकता है यह मन्त्रांश
पढ़कर - "रक्षोहणौ वां वलगहनौ पर्यूहामि वैष्णवी" (यजु० ५।२५) - "राक्षसों और जादू-टोने
को नष्ट करनेवाले तुमको ढाँपता हूँ। तुम विष्णु के हो।" इस प्रकार वह इनको दृढ़ और न
हिलनेवाला बनाता है ॥२२॥
अब सोम निचोड़ने का चमड़ा सीधा काटा जाता है और सम्पूर्ण लाल रंग से रंगा जाता