शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ३, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० २०-२५ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४३१
दोनों यहाँ पृथिवी की ऊँचाई पर ठहरो।" यह (उत्तर वेदी ही) ऊँचाई है। आहवनीय द्यौलोक
में है। वह उनके नाभि में खड़ी करता है, शान्ति का यही रूप है ॥२०॥
उत्तर की ओर चलकर अध्वर्यु दक्षिणी हविर्धान को ठहराता है यह मन्त्र पढ़कर—
“विष्णोर्नु॒ कं वीर्या॑णि॒ प्रवो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑१॑सि। योऽअस्क॑भाय॒दुत्त॑र॒ स॒धस्थं॑
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा” (यजु० ५।१८) - "मैं अब विष्णु के पराक्रम कहता हूँ जिसने
पृथिवी के देशों को नापा, जिसने उत्तर के (ऊपरी) स्थान को स्थापित किया, तीन बड़े पग
चलकर। विष्णु के लिए मैं तुझे स्थापित करता हूँ।" जहाँ खड़ा किया करते हैं वहाँ से हटकर
दूसरी जगह खड़ा करता है ॥२१॥
प्रतिप्रस्थाता उत्तरी हविर्धान को खड़ा करता है यह मन्त्र पढ़कर - "दिवो वा विष्णऽउत
वा पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत
सव्यादा विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१६)--"हे विष्णु, या तो द्यौलोक से या पृथिवी से या बड़े विस्तृत
अन्तरिक्ष से दोनों हाथों से धन को भर और दाईं और बाईं दोनों ओर से दे । विष्णु के लिए
तुझको।" वहाँ नियत स्थान से अन्य स्थान पर खड़ा करता है। विष्णु-सम्बन्धी यजुओं को इस-
लिए पढ़ता है कि हविर्धान विष्णु की है ॥२२॥
बीच की चटाई को छूकर (यजमान से) कहलवाता है - "प्र तद् विष्णु स्तवते वीर्येण
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्बधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा" (यजु०
५।२०) - "उस विष्णु के पराक्रम के लिए स्तुति करो जो भयानक जन्तु के समान भयानक और
पहाड़ी जानवरों के समान भयानक है। जिसके तीन पदों पर सब संसार स्थित है।" यह चटाई
उस (छप्पर) की मुख्य शीर्ष कपाल है, क्योंकि इसी पर अन्य कपाल ठहरते हैं। इसीलिए कहा,
'अधिक्षियन्ति' ॥२३॥
अब रराट (टट्टी) को छूकर (यजमान से) कहलवाता है - "विष्णोः रराटमसि"
(यजु० ५।२१) - "तू विष्णु का ललाट है।" क्योंकि यह उसका ललाट है। अब दो टट्टियों को
छूकर कहलवाता है, "विष्णोः श्नप्त्रे स्थः” (यजु० ५।२१) - "तुम विष्णु के मुंह के किनारे हो।"
अब जो पीछे की चटाई है वह इसके पीछे का शीर्ष-कपाल है ॥२४॥
अब लकड़ी की कील से सीता है, यह कहकर - "विष्णोः स्यूरसि" (यजु० ५।२१) - "तू
विष्णु की सुई है।" अब गाँठ देता है पढ़कर - "विष्णोर्ध्रुवोऽसि” (यजु० ५।२१)- "तू विष्णु
का ध्रुव है।" यह गाँठ इसलिए देता है कि छूट न जाय। जब काम समाप्त हो जाता है तो गाँठ
खोल देता है। इस प्रकार न अध्वर्यु को रोग लगता है न यजमान को। जब छप्पर बन जाता है
तो कहता है 'वैष्णवमसि' (यजु० ५।२१) - "तू विष्णु का है।" क्योंकि हविर्धान विष्णु का
है ॥२५॥
अध्याय ५— ब्राह्मण ४
दो कारण हैं कि छिद्र बनाये जाते हैं। हविर्धान यज्ञ का सिर है। सिर में भी तो चार
छिद्र होते हैं, दो यह और दो यह (नाक और कान) । उसी प्रकार से वह भी बनाता है, इसी-
लिए छिद्र (उपरव) खोदता है ॥१॥
प्रजापति की दोनों सन्तान देव और असुर लड़ पड़े। असुरों ने इन लोकों में वलग
अर्थात् जादू-टोने को गाड़ दिया कि देवों पर विजय पा जावें ॥२॥
अब देव जीत गये । उन्होंने इन्हीं उपरवों की सहायता से टोनों को खोद डाला। जो
टोना खोद लिया जाय उसका प्रभाव नहीं रहता । यहाँ भी अगर किसी शत्रु ने टोना गाड़ दिया