शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
DevanagariSanskritpublished699 pages
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कां० ३, अ० ५, ब्रा० ३, कं० १३-२० शतपथब्राह्मण / ४२६
उसकी धूल में लिपटा है। स्वाहा।” जो घी बच रहा उसको पत्नी के हाथ में डाल देता है।
पत्नी उसको पहिये के गर्म भाग में मल देती है, यह मन्त्र पढ़कर—“देवश्रुतौ देवेष्वाघोषतम्”
(यजु० ५।१७) - “देवों से सुने गये तुम देवों के प्रति घोषणा करो।” अब वह स्रुच और आज्य-
पात्र को प्रतिप्रस्थाता को दे देता है। वे पत्नी को दोनों अग्नियों के पीछे होकर ले जाते हैं ॥१३॥
चार चम्मच घी लेकर प्रतिप्रस्थाता उत्तरी हविर्धान के बायें मार्ग में सोना रखकर इस
मन्त्र से आहुति देता है— “इरावती धेनुमती हि भूतं॒ सूयवसिनी मनवे दशस्या। व्यस्कम्ना
- रोदसी विष्णवेते दाधर्त्य पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा” (यजु० ५।१६, ऋ० ७।६६।३)—“मनुष्य
के कल्याण के लिए तुम दोनों अन्नवाले, गायवाले, धान्यवाले हो। हे विष्णु, तूने इन दोनों द्यौ
और पृथिवी को अलग-अलग कर और पृथिवी को चारों ओर से किरणों से घेर लिया। स्वाहा।”
शेष घी को पत्नी के हाथ में छोड़ता है, और वह उसको गर्म पहिये से मल देती है। यह मन्त्रांश
पढ़कर—“देवश्रुतौ देवेष्वाघोषतम्’ (यजु० ५।१७) यह आहुति क्यों देता है? (इसका उत्तर
आगे आयेगा) ॥१४॥
एक बार देवों ने यज्ञ का आरम्भ किया। और उनको असुर-राक्षसों के आक्रमण का
भय हुआ। घी वज्र है। उस वज्र-घी की सहायता से उन्होंने दक्षिण की ओर से असुरों को हटा
दिया, और वे उनके मार्ग में उनके पीछे न आये। इसी प्रकार यह भी असुर-राक्षसों को दक्षिण
की ओर से घीरूपी वज्र से हटा देता है। वह इन आहुतियों को विष्णु की दो ऋचाओं से (ऋ०
१।२२।१७ और ७।६६।३) क्यों देता है? इसलिए कि हविर्धान विष्णु का है ॥१५॥
पत्नी पहिये को घी क्यों लगाती है? इससे सन्तानोत्पत्ति होती है। जब स्त्री और पुरुष
गर्म होते हैं तो वीर्य बहता है। तब उत्पत्ति होती है। वह पहिये को गाड़ी से दूर दूसरी ओर
चुपड़ती है। क्योंकि वीर्य दूर ही सींचा जाता है। अब वह होता से कहता है, ‘आगे चलते हुए
हविर्धानों के लिए मन्त्र बोल’ ॥१६॥
अब वह (यजमान से) कहलवाता है-“प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती” (यजु० ५।१७)—
“तुम दोनों आगे को चलो, अध्वर को बढ़ाते हुए।” ‘अध्वर’ नाम है यज्ञ का। इसका तात्पर्य यह
है कि यज्ञ को बढ़ाते हुए आगे चलो। “ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम्” (यजु० ५।१७) - “यज्ञ
को ऊपर उठाओ। विचलित मत होने दो।” इससे तात्पर्य है कि यज्ञ को ऊपर देवों के लोक तक
उठाओ। ‘इसको विचलित न होने दो’ से तात्पर्य है कि यजमान विचलित न होवें। गाड़ी को
ऐसे चलावें कि मानो उठाकर चलाते हैं। पहियों की आवाज न हो, क्योंकि पहियों की आवाज
आसुरी होती है। उसका तात्पर्य यह है कि कहीं आसुरी शब्द न हो जाय। और यदि पहियों की
आवाज हो तो—॥१७॥
(यजमान से) कहलवावें — “स्वं गोष्ठमावदतं देवी दुर्येऽआयुर्मा निर्वार्दिष्टं प्रजां मा
निर्वार्दिष्टम्” (यजु० ५।१७) – “हे गृह-समान दोनों गाड़ियो, अपने गोष्ठ से बात करो। मेरी
आयु को मत नष्ट करो, मेरी प्रजा को मत नष्ट करो।” यही इसका प्रायश्चित्त है ॥१८॥
इसके विषय में कहते हैं कि उत्तर वेदी से पश्चिम की ओर तीन पग चले और वहाँ
हविर्धान को ठहरा दें। यही उसकी मात्रा है। परन्तु कोई नियत मात्रा नहीं है। जहाँ समझे कि
न तो बहुत दूर है न बहुत निकट, वहीं ठहरा दें ॥१९॥
नीचे के मन्त्र से नमस्कार करे— “अत्र रमेथां वर्ष्मन् पृथिव्याः” (यजु० ५।१७)-“तुम