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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 443 of 699

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Page 443

काँ० ३ अ० ५, ब्रा० २-३, कं० १०-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४२५
है। अब जो मध्य में नाभि है उसके जो सामने कोने हैं उनमें जो दक्षिणी कोना है—॥१०॥
उस पर घी छोड़ता है यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यसि॒ स्वाहा॑'' (यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी
है। स्वाहा।” अब पिछले कोनों में से उत्तरी कोने पर यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यस्या॑दित्य॒वनि॑:
स्वाहा॑" (यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी है आदित्यों को जीतनेवाली। स्वाहा।” पिछले दो कोनों
से दक्षिणी कोने पर यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यसि ब्रह्मवनि॑: क्षत्र॒वनि॑: स्वाहा॑'' (यजु० ५।१२)—
"तू सिंहिनी है ब्रह्म-तेज को जीतनेवाली, क्षत्र-तेज को जीतनेवाली, स्वाहा।” आशीर्वाद-सम्बन्धी
यजुर्वेद के मन्त्र बहुत-से हैं। वह इन दो से ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए आशीर्वाद देता है, क्योंकि
यही दोनों पराक्रम हैं ॥११॥
अब आगे के कोनों में से जो उत्तर का है उस पर—"सिँ॒ह्यसि सुप्रजावनी रायस्पोषवनि॑:
स्वाहा॑'' (यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी है अच्छी प्रजा को प्राप्त करनेवाली और धन को प्राप्त
करनेवाली। स्वाहा।” 'सुप्रजावनी' का अर्थ है कि सन्तान अधिक हो, 'रायस्पोष' का अर्थ है कि
धन का बाहुल्य हो ॥१२॥
अब वह मध्य में घी डालता है यह पढ़कर—"सिँ॒ह्यस्याव॑ह दे॒वान् यज॑मानाय॒ स्वाहा॑''
(यजु० ५।१२)—"तू सिंहिनी है, देवों को यजमान के लिए ला। स्वाहा।” इससे वह देवों को
यजमान के पास बुलाता है। अब वह स्रुच को उठाता है यह पढ़कर—"भूतेभ्यस्त्वा॑" (यजु०
५।१२)—"भूतों के लिए तुझको।” 'भूत' का अर्थ है प्रजा। 'प्रजा के लिए' यह तात्पर्य है ॥१३॥
अब वह परिधियों को रखता है, बीच की परिधि को यह मन्त्र पढ़कर—"ध्रु॒वोऽसि॑
पृथि॒वी दृ॑ह” (यजु० ५।१३)—"तू दृढ़ है, पृथिवी को दृढ़ कर।” दक्षिण की परिधि को यह
मन्त्र पढ़कर—"ध्रु॒वक्षि॑दस्यन्तरि॑क्षं दृँह" (यजु० ५।१३)—"तू दृढ़ है, अन्तरिक्ष को दृढ़
कर।” उत्तर की परिधि को यह मन्त्र पढ़कर—"अच्यु॑तक्षिदसि॒ दिवं॑ दृँह” (यजु० ५।१३)—
"तू दृढ़ है, द्यौलोक को दृढ़ कर।” और इस मन्त्र के सब सामान को उत्तर वेदी में फेंक देता है—
"अग्ने॑: पुरी॑षमसि” (यजु० ५।१३)—"तू अग्नि का भोजन (शरीर को पूरा करनेवाला) है।”
वह सामान किसलिए है? अग्नि की पूर्ति के लिए ॥१४॥
यह जो पीतु दारु है वह इसका शरीर है। ये जो पीतु दारु की लकड़ियां परिधियां
होती हैं, इसलिए वह इन परिधियों के द्वारा उसको शरीर देता है, अर्थात् उसकी पूर्ति करता
है ॥१५॥
यह जो गुल्गुल (उसका गोंद) है वह उस (अग्नि) का मांस है। यह जो गुल्गुलु है वह
मानो उसको मांस देता है अर्थात् उसकी पूर्ति करता है। (शायद पीतु दारु के गोंद को गुल्गुलु
कहते हैं) ॥१६॥
सुगन्धि-तेज उसकी गन्ध है। सुगन्धि-तेज से मानो वह उसे सुगन्धि से सम्पन्न करता है।
उसकी पूर्ति करता है ॥१७॥
मेंढे की पूंछ के बाल क्यों होते हैं? (?) अग्नि एक बार एक रात को मेंढे के दो सींगों
के बीच में रहा था। वह सोचता है कि अग्नि का जो अंश उसमें था वही यहाँ भी हो, इसलिए मेंढे
के बाल होते हैं। इसलिए बालों के उस गुच्छे को काटना चाहिए जो सिर के बिल्कुल पास हो
और यदि वह न मिले तो जो मिले वही लावे। परिधियां क्यों होती हैं? अग्नि की रक्षा के लिए।
क्योंकि अभी वह समय दूर है जब अगली परिधियां आवेंगी ॥१८॥
अध्याय ५—ब्राह्मण ३
यज्ञ पुरुष है। पुरुष इसलिए है कि इसको पुरुष ही तानता है। तनकर यह उतना ही हो
जाता है जितना पुरुष होता है। इसीलिए यज्ञ पुरुष है ॥१॥
हविर्धान अर्थात् सोम ले-जानेवाली गाड़ी का घर सिर है। विष्णु इसका देवता है। और
चूंकि इसमें सोम होता है और सोम देवताओं का हवि है, इसलिए इस गाड़ी को हविर्धान कहते
हैं ॥२॥
आहवनीय मुख है। इसलिए जब वह आहवनीय में आहुति देता है तो मानो मुख के