Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 437 of 699

Read in context
Page 437

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० २१-३० शतपथब्राह्मण / ४१६
सिंहिनी बनकर उन दोनों देव और असुरों के बीच में जो कुछ मिला उसको खाने लगी। देवों ने
उसको बुलाया और असुरों ने भी। देवों का दूत 'अग्नि' था और असुर-राक्षसों का 'सह-
रक्षा' ॥२१॥
देवों के पास आने की इच्छा करती हुई वह बोली, 'यदि मैं तुम्हारी ओर आ जाऊँ तो
मुझे क्या मिलेगा ?' 'तेरे लिए अग्नि से भी पूर्व आहुति मिलेगी।' तब उसने देवों से कहा,
'तुम मेरे आशीर्वाद द्वारा जो चाहोगे वह तुमको प्राप्त होगा।' अतः वह देवों के पास चली
गई ॥२२॥
इसलिए उत्तर वेदी में अग्नि का आधान करके जब वह आहुति देता है तो वह आहुति
वाणी को अग्नि से भी पूर्व पहुँच जाती है, क्योंकि देवों ने कहा था कि तुझे अग्नि से पहले ही
आहुति पहुँच जाया करेगी, क्योंकि जो उत्तर वेदी है वह वस्तुतः वाणी ही है। यह जो उत्तर वेदी
को बनाता है वह यज्ञ की पूर्णता के लिए ही बनाता है। वाणी ही यज्ञ है। वाणी ही यह उत्तर
वेदी है ॥२३॥
वह उस वेदी को युग और शम्या से नापता है—युग से उस स्थान को जहाँ मिट्टी लाते
हैं, और शम्या से उस स्थान को जहाँ से मिट्टी लाते हैं। (शायद युग का अर्थ है डण्डा या जुआ
और शम्या का कील ?) क्योंकि बैलों को जुए और कील से जोता जाता है। चूँकि वह सिंहिनी
बनकर अशान्ति से विचरती रही, इसलिए वह उसको यज्ञ में जोतता (बांधता) है ॥२४॥
इसलिए तिरस्कृत दक्षिणा को न ग्रहण करना चाहिए (अर्थात् यदि एक ऋत्विज् दक्षिणा
न ले तो उस दक्षिणा को दूसरा ऋत्विज न ले), नहीं तो वह सिंहिनी बनकर हानि पहुँचाती है।
न (यजमान) उसे घर वापस ले जाये, क्योंकि सिंहिनी होकर वह उसे हानि पहुँचाती है। वह न
किसी दूसरे को दे, नहीं तो अपने यज्ञ को दूसरे का बना देगा। यदि उसका कोई पापी
रिश्तेदार हो उसे दे दे। तब वह सिंहिनी होकर हानि न पहुँचायेगी। और चूँकि वह अपने ही
रिश्तेदार को देता है इसलिए यज्ञ को अपने से अलग नहीं करता। तिरस्कृत दक्षिणा का यही
निर्णय है ॥२५॥
अब वह शम्या और स्फ्या को लेता है। जहाँ पूर्वार्ध की उत्तरी कील (शंकु) होती है
वहाँ से तीन पग पीछे की ओर भरता है और वहाँ 'चात्वाल' का चिह्न बना देता है। चात्वाल
की मात्रा वही होती है जो उत्तर वेदी की। और कोई मात्रा नहीं है। जहाँ उसका मन चाहे उत्कट
अर्थात् कूड़े के चात्वाल बना दे ॥२६॥
वह वेदी के अन्त से उत्तर की ओर शम्या को रखता है और रेखा खींच देता है इस मन्त्र
को पढ़कर—"तप्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"मेरे लिए तू वह स्थान है जहाँ पीड़ित लोग
सहारा पाते हैं।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है जिस पर वह पीड़ित होकर चलता है ॥२७॥
अब वह आगे की ओर उत्तर को शम्या रखता है और रेखा खींचता है, यह पढ़कर—
"वित्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"तू मेरा धन का स्थान है।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है
क्योंकि यहीं वह धन प्राप्त करके चलता है ॥२८॥
अब वह वेदी के किनारे पर पूर्व की ओर शम्या रखता और रेखा खींचता है, यह पढ़-
कर—"अवतान् मा नाथितात्" (यजु० ५।६)—"मुझे दरिद्रता से बचा।" इससे भूमि से तात्पर्य
है अर्थात् जहाँ-जहाँ दरिद्रता हो वहाँ से मुझे बचा ॥२९॥
अब वह उत्तर की ओर पूर्व को शम्या रखता है और रेखा खींचता है यह मन्त्र पढ़कर-