Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 435 of 699

Read in context
Page 435

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० १०-२१ शतपथब्राह्मण / ४१७
है ॥१०॥
यह पीछे चौड़ी क्यों होती है ? स्त्रियों की प्रशंसा करते हैं कि इनकी श्रोणी (पिछला
भाग) चौड़ी है । पिछले भाग के चौड़े होने से कोख बड़ी हो जाती है । कोख से ही सब प्रजा
उत्पन्न होती है ॥११॥
उत्तर वेदी यज्ञ की नाक है। यह ऊपर को उठी होती है इसीलिए इसका नाम 'उत्तर
वेदी' है ॥१२॥
पहले दो प्रकार की प्रजा थी—आदित्य और अंगिरा । सबसे पहले अंगिरों ने यज्ञ का
आरम्भ किया और अग्नि से बोले, 'आदित्यों से कह दो कि कल हमारे सोम-भाग में शामिल
हों' ॥१३॥
आदित्य बोले, 'ऐसी तरकीब करो कि अंगिरा लोग हमारे यज्ञ में आवें, न कि हम उनके
में' ॥१४॥
उन्होंने कहा, 'इसकी तरकीब केवल यज्ञ ही हैं। हम दूसरा सोम-यज्ञ करें।' उन्होंने
यज्ञ की सामग्री इकट्ठी की, "हे अग्नि, तूने तो हमको कल के सोम-याग का बुलावा दिया है,
हम तो तुझको और अंगिरों को आज के ही सोम-याग का न्योता देते हैं। तू हमारे लिए होता
बन' ॥१५॥
उन्होंने किसी को अंगिरों के पास भेजा । परन्तु अंगिरों ने अग्नि का पीछा किया और
इस पर क्रुद्ध होकर बोले कि जब तू हमारा दूत थी तो तूने हमारा आदर क्यों नहीं किया ॥१६॥
उसने कहा कि 'अनिन्द्य' अर्थात् निर्दोष लोगों ने मेरा वरण किया । निर्दोषों से वरी
जाकर मैं उनका कहना टाल न सकी।' इसलिए अगर कोई निर्दोष मनुष्य किसी (होता) का
वरण कर ले तो उसको इनकार नहीं करना चाहिए। तब अंगिरों ने आदित्यों के सोमयाग को
उसी दिन कराया । उसका नाम है 'सद्यः-क्री' ॥१७॥
उन्होंने उनको वाणी की दक्षिणा दी। उन्होंने उस (वाणी) को स्वीकार नहीं किया,
क्योंकि यदि इसे स्वीकार करेंगे तो हमको हानि होगी। इसलिए यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ क्योंकि उसमें
दक्षिणा की कमी रह गई ॥१८॥
इस पर वे दक्षिणा के लिए उनके पास सूर्य को लाये । उन्होंने सूर्य को स्वीकार कर
लिया । इसीलिए अंगिरा लोग कहते हैं, 'हम याज्ञिक होने के योग्य हैं; हम दक्षिणा लेने के योग्य
हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसका हमने ग्रहण किया है।' इसलिए 'सद्यः-क्री' यज्ञ की
दक्षिणा सफेद घोड़ा होता है ॥१९॥
इस घोड़े के आगे एक सोने का आभूषण होता है। इस प्रकार वह उसका प्रतिरूप हो
जाता है जो ऊपर तपता है (अर्थात् सूर्य) ॥२०॥
अब वाणी उनसे नाराज हो गई—'वह मुझसे किस बात में अच्छा है ? उन्होंने उसको
क्यों स्वीकार किया, मुझे क्यों न स्वीकार किया ?' ऐसा कहकर वह वहाँ से चली गई। और