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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 431 of 699

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Page 431

कां० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १५-२६ शतपथब्राह्मण / ४१३
प्रकार वह वर्ष के चक्र को बनाता है ॥१५॥
संवत्सर वज्र है। इसी संवत्सर वज्र के द्वारा दोनों देवों ने किलों को तोड़ा और इन
लोकों को जीता। इसी प्रकार यह भी इसी संवत्सर वज्र की सहायता से इन लोकों को तोड़ता
और इन लोकों को जीतता है। इसीलिए वह इन देवतों का यजन करता है ॥१६॥
तीन उपसदों को करे। संवत्सर में तीन ऋतुएँ होती हैं। इस प्रकार संवत्सर का तद्रूप
आ जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता
है ॥१७॥
यह छः के बराबर हो जाते हैं। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो
जाता है। वह इस प्रकार वर्ष को बनाता है ॥१८॥
या बारह उपसदों को करे। वर्ष में बारह मास होते हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो
जाता है। वह इस प्रकार वर्ष बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता है ॥१९॥
इस प्रकार चौबीस हो जाते हैं। वर्ष में चौबीस अर्द्धमास होते हैं। यह संवत्सर का रूप
हो जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है ॥२०॥
वह सायं-प्रातः इसलिए करता है कि इसी से सम्पूर्णता आती है। प्रातःकाल की क्रिया
का अर्थ है जय, सायंकाल की क्रिया का 'सुजय' और आहुति का अर्थ है कि जीतकर किले को
अपना समझकर भीतर घुस जाना ॥२१॥
उपसदों के करने का अर्थ है युद्ध करना, क्रिया के पूर्ण होने का अर्थ है विजय पाना,
और आहुति देने का अर्थ है किले को अपना करके उसमें घुस जाना ॥२२॥
वह दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्नेऽयःशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह
जो तेरा लोहे का शरीर है, गहरे में बैठा हुआ, इसने (शत्रु की) उग्र वाणी को मार डाला,
तीक्ष्ण वाणी को मार डाला।" वह ऐसी ही थी। वह लोहे के समान थी ॥२३॥
अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्ने रजःशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह
जो तेरा चांद का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को
मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। चांदी का रूप था ॥२४॥
अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या तेऽग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत् त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८) - "हे अग्नि, यह
जो तेरा सोने का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को
मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। सोने का रूप था। अगर वह बारह उपसदों को करे तो
हर एक को चार दिन करना चाहिए ॥२५॥
अब व्रत-उपसदों को लीजिये। कुछ उपसद चौड़े होते जाते हैं और कुछ तंग, जिनमें