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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 429 of 699

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Page 429

का० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ३-१५ शतपथब्राह्मण / ४११
द्यौलोक में ॥३॥
अब देवों की जीत हुई। देवों ने इन किलों को उपसदों के द्वारा घेरा (उपासीदन्);
उपासीदन् से 'उपसद' नाम पड़ा। उन्होंने किलों को तोड़ डाला और लोकों को जीत लिया।
इसलिए कहते हैं कि 'उपसदों के द्वारा किले जीते जाते हैं।' वस्तुतः घेरा डालकर ही मनुष्य के
किले जीते जाते हैं ॥४॥
देवों ने इन उपसदों के द्वारा ही किलों को तोड़ा और लोकों को जीत लिया। (यजमान
भी) ऐसा ही करता है। यह सच है कि कोई उसके विरुद्ध अपने किले नहीं बनाता। वह इन्हीं
लोकों को भेद देता है। वह इनको जीत लेता है। इसीलिए उपसदों के द्वारा यज्ञ करता है ॥५॥
ये आहुतियां घृत की होती हैं। घी वज्र है। इस वज्र-घी से देवों ने किलों को तोड़कर
इन लोकों पर विजय पाई। इसी प्रकार यह यजमान वज्र-घी द्वारा इन लोकों का भेदन करता
है, इन लोकों को जीतता है। इसलिए ये घी की आहुतियां दी जाती हैं ॥६॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत् में। कुछ उलटा भी करते हैं
अर्थात् चार बार जुहू में और आठ बार उपभृत् में ॥७॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत में। इससे वह वज्र के आगे के
भाग को भारी कर देता है। वज्र के इस भारी भाग से इन लोकों को तोड़ देता और इन पर
विजय प्राप्त कर लेता है ॥८॥
देवताओं में अग्नि और सोम का जोड़ा है। इनके लिए एक-साथ लेता है। विष्णु के
लिए अकेली। एक ही आघार देता है जो स्रुवा में भरी जाती है, क्योंकि जब पीछे की आघार दे
देता है तो चल देता है यह कहकर कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इसलिए स्रुवा से एक ही आघार
देता है ॥९॥
श्रौषट् कहने के पीछे होता का वरण नहीं करता। इतना ही कहता है कि 'हे होता,
बैठ।' होता अपने स्थान पर बैठ जाता है। अब वह अध्वर्यु को प्रेरणा करता है और अध्वर्यु दो
चमचे भर लेता है ॥१०॥
(वेदी के दक्षिण की ओर) जाते हुए वह (होता से) कहता है 'अग्नि को आवाहन
कर।' और श्रौषट् कहकर कहता है 'अग्नि की स्तुति कर।' और वषट्कार के पीछे आहुति दे
देता है ॥११॥
अब कहता है—'सोम का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है—'सोम की
स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे आहुति दे देता है ॥१२॥
अब उपभृत में जो घी होता है उसको (जुहू के बचे घी में) मिलाकर कहता है—'विष्णु
का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है 'विष्णु की स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे
आहुति दे देता है ॥१३॥
वह एक ही स्थान पर खड़ा रहता है। और जैसा चलना-फिरना चाहिए, चलता-फिरता
नहीं। इसका कारण यह है कि वह सोचता है कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इन देवताओं के लिए
आहुति इसलिए देता है कि वज्र बना सकूं। अग्नि को वज्र का 'अनीक' या सिरा बनाता है,
सोम को शल्य और विष्णु को कुल्मल (ये वज्र के भाग हैं) ॥१४॥
संवत्सर ही वज्र है। अग्नि दिन है और सोम रात तथा बीच का भाग विष्णु। इस