शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextका० ३, अ० ४, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / ३६५
सिर के दोनों ओर बाहू होते हैं। इसलिये प्रायणीय और उदयनीय आहुतियाँ आतिथ्य के दोनों
ओर होती हैं ॥१॥
यह आतिथ्य नाम यों पड़ा। यह जो खरीदा गया सोम है वह यजमान के पास अतिथि
के रूप में आता है। जैसे राजा या ब्राह्मण के सत्कारार्थ [साथ आए] महोक्ष (बड़े बैल) या महाज
(बड़े बकरे) को पकाते (पोषित करते) हैं, यह मानुषी सत्कार होता है, इसी प्रकार देवताओं
के लिए हवि दी जाती है, इसलिए आतिथ्य-सत्कार किया जाता है। (सम्भव है 'महोक्ष' और
'महाज' किन्हीं भोजनविशेष के नाम हों) ॥२॥
इस पर कहते हैं कि पहले सोम के पास जाये; तब आतिथ्य की सामग्री निकाले। जब
कोई अर्हन्त आता है और उसका कोई आदर नहीं करते तो वह क्रुद्ध हो जाता है। इस प्रकार
सोम का सत्कार किया जाता है ॥३॥
उन (गाड़ी के बैलों) में से एक को मुक्त कर दे (जुआ खोल दे) और दूसरे को नहीं।
एक को विमुक्त करने का अर्थ यह हुआ कि सोम आ गया, और दूसरे को न छोड़ने का अर्थ यह
हुआ कि उसका सत्कार किया गया। (युक्ति हमारी समझ में नहीं आई—अनुवादक) ॥४॥
परन्तु ऐसा न करना चाहिए। दोनों बैलों को खोलने और शाला में सोम के आने के
पश्चात् सामग्री निकाले। जैसा देवों का चलन होता है वैसा ही मनुष्यों का। मनुष्यों में चलन
यह होता है जब आगन्तुक बैल खोल देता है और भीतर आ जाता है तभी पानी लाते हैं और
सत्कार करते हैं, क्योंकि तभी वह 'आया हुआ' समझा जाता है। इसी प्रकार बैल खोलकर और
सोम को भीतर लाकर ही सामग्री इकट्ठी करे ॥५॥
इसमें शीघ्रता करनी चाहिए। सत्कार की यही रीति है। एक ओर से पत्नी आरम्भ
करती है और दूसरी ओर से यजमान। इस प्रकार सोम के दोनों ओर पति और पत्नी लगते हैं।
जब कोई अर्हन्त आता है तो सभी मिलकर सत्कार करते हैं। इसी प्रकार चेष्टा करते हैं और
इसी प्रकार सत्कार किया जाता है ॥६॥
इस सामग्री को भिन्न यजुः से ग्रहण करे; उसी से नहीं जिससे अन्य हवियां ग्रहण की
जाती हैं। क्योंकि जब सोम खरीदा जाता है तो विशेष कार्य के लिए खरीदा जाता है अर्थात्
छन्दों के राज्य के लिए, छन्दों के साम्राज्य के लिए। छन्द सोम के परिचारक (सेवक) होते हैं।
जैसे सूत या ग्रामीण लोग जो राजा नहीं हैं राजा के सेवक होते हैं, इसी प्रकार छन्द भी सोम के
परिचारक होते हैं ॥७॥
ऐसा न चाहिए कि केवल छन्दों के लिए ही सामग्री ग्रहण करे। जब किसी अर्हन्त के
लिए भोजन बनाते हैं तो जो उसके साथी सूत या ग्रामीण मनुष्य हैं,उनको भी राजा के साथ-
साथ खाना देते हैं। इसी प्रकार जब सोम के सत्कार की सामग्री इकट्ठी करे तो छन्दों के लिए भी
भाग निकाले ॥८॥
इस मन्त्र से ग्रहण करे—"अग्नेस्तनूरसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)—"तू अग्नि का
शरीर है। विष्णु के लिए तुझको।" अग्नि गायत्री है। इस प्रकार गायत्री को उसका भाग
मिलता है ॥६॥
"सोमस्य तनूरसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)-"सोम का तू शरीर है। विष्णु के लिए
तुझको।" सोम क्षत्र है। क्षत्र त्रिष्टुभ् है। इसलिये त्रिष्टुभ् का सत्कार किया जाता है ॥१०॥
"अतिथेरातिथ्यमसि विष्णवे त्वा" (यजु० ५।१)-"अतिथि का आतिथ्य है तू। तुझको