शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ३, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ३८७
सोम को जल के समीप मोल लेता है। जल ही रस है। इस प्रकार वह उसको रस-युक्त
करता है। सोने के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको शुक्र-(तेज)-सहित मोल लेता है। वस्त्र
के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको चमड़े-सहित मोल लेता है। बकरी के होने का तात्पर्य
यह है कि वह उसको तप के साथ मोल लेता है। गाय के होने का तात्पर्य यह है कि वह उसको
दूध-सहित मोल लेता है जिससे सोमरस में मिलाया जा सके। गायों के जोड़े का अर्थ यह है कि
वह सोम को जोड़े के साथ मोल लेता है। सोम को दश चीजों के बदले मोल ले। दश से कम
या ज्यादा नहीं, क्योंकि विराट् छन्द में दश अक्षर होते हैं। सोम विराट् है इसलिए दश के बदले
खरीदे, न्यूनाधिक के बदले नहीं ॥१८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
गाड़ी के नीड अर्थात् बन्द स्थान में काले हिरन के चर्म को रखता है यह कहकर—
“अदित्यास्त्वगसि” (यजु० ४।३०)-“तू अदिति की त्वचा है।” अब वह सोम को रख देता है यह
कहकर-“अदित्यै सदऽआसीद” (यजु० ४।३०)-“तू अदिति के स्थान पर बैठ।” यह पृथिवी
ही अदिति है और यही प्रतिष्ठा है। इस प्रकार वह उसको इस प्रतिष्ठा में स्थापित करता है।
इसीलिए कहा, 'तू अदिति के स्थान पर बैठ' ॥१॥
अब वह सोम को छूकर पढ़ता है-“अस्तभ्नाद् द्यां वृषभोऽअन्तरिक्षम्” (यजु० ४।३०)-
“इस वृषभ ने द्यौ और अन्तरिक्ष को उभारा।” देवों ने यज्ञ ताना और वे असुर राक्षसों के
आक्रमण से डरे। उन्होंने इस सोम को वध की अपेक्षा बड़ा कर दिया। इसीलिए कहा,
'अस्तभ्नाद्' इति ॥२॥
“अमिमीत वरिमाणं पृथिव्याः” (यजु० ४।३०)-“उसने पृथिवी के विस्तार को मापा।
इस प्रकार इस सोम की सहायता से इन लोकों को प्राप्त करता है। जिसने इन लोकों को प्राप्त
कर लिया उसके लिए न कोई वध है, न मारनेवाला। इसीलिए कहता है, 'अमिमीत वरिमाणं
पृथिव्याः' ॥३॥
“आसीदद् विश्वा भुवनानि सम्राट्” (यजु० ४।३०)-“सब भुवनों में वह सम्राट् के रूप
में बैठा।” इसकी सहायता से वह 'सब' की प्राप्ति करता है। जिसको इस 'सब' की प्राप्ति हो
गई उसके लिए कोई घातक या वध करनेवाला नहीं रहता। इसीलिए 'आशीदद्' मन्त्र
पढ़ा ॥४॥
“विश्वेत् तानि वरुणस्य व्रतानि” (यजु० ४।३०)-“वस्तुतः ये वरुण के व्रत हैं।” इसके
द्वारा वह सबको उसका अनुयायी करता है, अर्थात् जो कुछ यहाँ है अथवा जो कोई प्रतिकूल है
उस सबको। इसीलिए 'विश्वेत् तानि' मन्त्र पढ़ा गया ॥५॥
अब सोम पर्याणहन अर्थात् सोम-वस्त्र से सोम को लपेटता है कि दुष्ट राक्षस उसको छू
न ले। वस्तुतः यह गर्भ है, गर्भ छिपा रहता है; और यह जो ढका हुआ है वह भी छिपा रहता
है। देव मनुष्यों से छिपे रहते हैं। जो ढका हुआ है वह भी छिपा रहता है, अतः सोम को कपड़े
में लपेटता है ॥६॥
इस मन्त्र को पढ़कर लपेटता है-“वनेषु व्यन्तरिक्षं ततान” (यजु० ४।३१)-“वनों के
ऊपर अन्तरिक्ष ताना गया।” वनों अर्थात् वृक्षों के सिरों पर तो अन्तरिक्ष तना हुआ है ही।
“वाजमर्वत्सु पयऽउस्रियासु” (यजु० ४।३१)-“मनुष्यों में वीर्य और गायों में दूध।” यहाँ 'वाज्'
का अर्थ है वीर्य और 'अर्वन्त' का अर्थ है मनुष्य। इस प्रकार मनुष्यों में वीर्य धारण करता है।