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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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में, यह आगे की पीढ़ियों को सौंपकर । कौतूहल, जिज्ञासा और समाधान की यह प्रक्रिया अतीत-
काल में आरम्भ हुई थी, और जबतक पृथिवी पर मनुष्य जीवित है, यह बनी रहेगी ।
इस त्रिविध पद्धति के फलस्वरूप मनुष्यों को प्रारम्भ में जो पुरुषार्थ-प्रेरक प्रेरणायें
मिलीं उनसे मानव-समाज का विकास हुआ और शनैः-शनैः उस समाज में उदात्तगुणों का प्रस्फुटन
हुआ । बाद में इसी त्रिविधता ने समाज में वैभव के साथ-साथ विलास, दुर्गुण, प्रमाद, आलस्य,
द्वेष, सत्तारूढ़िता, वैमनस्य आदि उत्पन्न किये । कर्म के स्थान पर कर्मकाण्ड आसीन हो गया, और
समाज शिथिल हो गया । हमारे समस्त ब्राह्मणग्रन्थ इसी युग की कृतियाँ हैं। वेद कर्म का प्रेरक
रहा, ब्राह्मण-ग्रन्थ कर्मकाण्ड के प्रेरक हो गए। किन्तु इस ब्राह्मण-वाङ्मय में समाज का वह समस्त
इतिहास भी छिपा हुआ है, जो कर्मकाण्ड से पूर्व समाज को प्राप्त हो गया था । दोनों युगों के इस
अन्तर को नहीं भूलना चाहिए—(१) वैदिक युग—कर्म और पुरुषार्थ का प्रेरक (उदात्तयुग)
(२) ब्राह्मण-युग—कर्मकाण्ड का प्रेरक—समाज के शैथिल्य का युग ।
ऐसा लगता है कि चारों वेदों ने (कृष्ण और शुक्ल यजुर्वेदों को अलग मानें, तो पाँचों
वेदों ने) हमारे समाज को पाँच भागों में बाँट दिया । ऋग्वेद के अभिप्राय से, अर्थात् ऋग्वेद की
ऋचाओं को लेकर जो कर्मकाण्ड किया जाने लगा, उसकी झाँकी ऐतरेय ब्राह्मण में मिलेगी ।
यजुर्वेद परम्परावालों का ब्राह्मणग्रन्थ शतपथब्राह्मण कहलाया, कृष्णयजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता)
वालों का तैत्तिरीय ब्राह्मण, सामवेदवालों का साम ब्राह्मण (ताण्ड्य ब्राह्मण) और अथर्ववेद से
सम्बन्ध रखनेवाला गोपथ ब्राह्मण ।
सायणाचार्य वैदिक वाङ्मय का सबसे बड़ा सम्पादक और भाष्यकार हुआ है । इसने
शुक्लयजुर्वेद पर तो भाष्य नहीं किया, किन्तु शतपथब्राह्मण (माध्यन्दिननीय) पर इसका भाष्य
उपलब्ध है । डॉ० अल्बर्ट वेबर (Albert Weber) ने जो शतपथब्राह्मण बड़े परिश्रम से सम्पा-
दित करके बर्लिन (जर्मनी) से मार्च १८४६ ई० में छापा था, उसमें उसने सायणाचार्य के
अतिरिक्त हरि स्वामी और द्विवेद गङ्ग के भाष्यों से भी कुछ अंश दिये थे। वाराणसी के प्रसिद्ध
संस्कृत-साहित्य-प्रकाशक और विक्रेता "चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस" ने १६६४ में वेबेर के
शतपथ ब्राह्मण का पुनर्मुद्रण किया ।
माध्यन्दिन शाखा के शतपथ ब्राह्मण के सम्पादन के लिए वेबेर को चेम्बर्स संग्रह
(Chambers Collection) से माध्यन्दिन शाखा के शतपथ ब्राह्मण की हस्तलिखित प्रति मिली
जो बर्लिन की रॉयल लाइब्रेरी में सुरक्षित थी। प्रशिया के राजा ने यह प्रति इस पुस्तकालय को
भेंट की थी । वेबेर ने अपने शतपथ ब्राह्मण का संस्करण हिज़ एक्सेलेन्सी शेवेलिए डॉ० सी० सी०-
जे० बुन्सन (The Chevalier Dr. C. C. J. Bunsen) को समर्पित किया है, जो स्वयं अपने
पाण्डित्य और नीति-कुशलता के लिए विख्यात था । डॉ० बुन्सन की कृपा से ही वेबेर को यह
पाण्डुलिपि सम्पादन के लिए मिल पायी थी । कई अन्य खण्डित प्रतिलिपियाँ भी चैम्बर्स संग्रह में
विद्यमान हैं, जिनसे डॉ० वेबेर ने सहायता ली । इन प्रतियों के अतिरिक्त एक और प्रति वेबेर
को सहायक हुई—रेवरेण्ड डॉ० मिल (Rev. Dr. Mill) की, जो ऑक्सफोर्ड की बॉडलियन
(Bodleian) पुस्तकालय में है। इस पाण्डुलिपि के काण्ड १-५, और काण्ड ७-१३ सम्वत्
१७०५-७ में श्री वृद्ध नगर के लिखे हुए हैं (पुरुषोत्तम के पुत्र दामोदर द्वारा) । इसपर ४० वर्ष
के बाद किसी व्यक्ति विद्याधर ने स्वरचिह्न लगाए थे ।
माध्यन्दिन शाखा के शतपथब्राह्मण में १४ काण्ड हैं, जिनका विवरण हम तालिका में
देते हैं—