शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ३, अ० २, ब्रा० ४, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ३७१
कि इसको प्रसन्न करके ही सोम को क्रय करूँगा ॥१०॥
अब वह आहुति देता है इस मन्त्र से- "जूरसि" (यजु० ४।१७)- "तू स्तुतिकरनेवाला है।"
'जू' वाणी का एक नाम है। अब कहता है- "धृता मनसा" (यजु० ४।१७)- "मन से धारण की
गई।" यह वाणी मन से धारण की जाती है क्योंकि पहले मन चलता है, और कहता है 'यह कह,
यह मत कह।' यदि मन साथ न हो तो वाणी असंगत हो जाय, इसलिए वह कहता है 'मन से
धारण की गई' ॥११॥
अब कहता है- "जुष्टा विष्णवे" (यजु० ४।१७)- "विष्णु के लिए प्रिय।" इसका तात्पर्य
है 'सोम के लिए, जिसको हम प्राप्त हो रहे हैं।' अब कहता है— "तस्यास्ते सत्यसवसः प्रसवेः"
(यजु० ४।१८)- "तुझ सत्य प्रेरणावाली की प्रेरणा के लिए।" अर्थात् तू सत्य प्रेरणवाली है।
सोम के पास जा। अब कहता है— "तन्वो यन्त्रमशीय स्वाहा' (यजु० ४।१८)- "मैं अपने शरीर
का बल प्राप्त करूँ।" जो यज्ञ की पूर्णता प्राप्त करता है वह शरीर का बल भी प्राप्त करता है।
इसका तात्पर्य है कि यज्ञ की पूर्णता प्राप्त करूँ ॥१२॥
अब वह सोने को (जुहू में से) निकालता है। इससे वह मनुष्यों को सोना देता है। यदि
वह घी के साथ सोने की भी आहुति दे डाले तो मानो वह मनुष्यों से सोने को छीन ले अर्थात्
मनुष्यों में सोना मिले ही नहीं ॥१३॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर सोने को निकालता है- "शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्व-
देवमसि" (यजु० ४।१८)- "तू शुद्ध है, तू चमकदार है, तू सब देवों को प्रिय है।" सम्पूर्ण दूध से
आहुति देकर जब कहता है कि 'तू शुक्र है' तो यह शुक्र ही है। 'तू चन्द्र है' कहता है तो यह चन्द्र
ही है। 'तू अमृत है।' यह अमृत है ही। 'तू सब देवों को प्रिय है।' यह सब देवों को प्रिय है ही।
अब तृण को खोलकर बर्हि के ऊपर डालता है और सूत्र के सोने को बाँधता है ॥१४॥
अब फिर घी के चार भाग करके कहता है— 'यजमान, चलो।' वे शाला के (दक्षिण
और पूर्व के) द्वार खोलते हैं (और बाहर आ जाते हैं)। द्वार की दाहिनी ओर सोम-क्रय करने-
वाली (गाय) खड़ी होती है। उसको सामने करके मानो उसने गाय को सोम-प्राप्ति के लिए
भेज दिया, क्योंकि सोम-क्रयणी गाय ही वाणी है। इस आहुति से उसने इसी को प्रसन्न किया
है, इस आशा से कि जब यह प्रसन्न हो जायगी तो मैं इससे सोम खरीद सकूँगा ॥१५॥
अब उसके पास जाकर अभिवादन करता है, यह मन्त्र पढ़कर- "चिदसि मनोसि" (यजु०
४।१६)- "तू चित् है, तू मन है।" वाणी चित् और मन की अनुगामिनी है। अब कहता है—
"धीरसि दक्षिणासि" (यजु० ४।१६)- "तू बुद्धि है, तू दक्षिणा है।" बुद्धि से ही लोग जीविका
कमाते हैं, वेदपाठ से या बातचीत करके या कथा कहकर। इसलिए कहा कि 'तू धी है।' उसको
'दक्षिणा' कहता है क्योंकि वह 'दक्षिणा' है ही। "क्षत्रियासि यज्ञियासि" (यजु० ४।१६)-"तू
श्रेष्ठ है, तू पूज्या है।" वस्तुतः वह श्रेष्ठ और पूज्या है। "अदितिरसि उभयतः शीर्णी" (यजु०
४।१६)- "तू दो सिरवाली अदिति है।" क्योंकि वाणी से ही वह ठीक को बेठीक कहता है, पीछे
को पहले कहता है। इसीलिए कहा कि 'तू दो सिरवाली अदिति है' ॥१६॥
अब कहता है— "सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधि" (यजु० ४।१६)- "वह हमारे लिए आगे
और पीछे शुभ हो।" 'आगे शुभ हो' कहने से तात्पर्य है कि 'तू हमारे लिए सोम लाने के लिए
आगे चल। और 'पीछे शुभ हो' से तात्पर्य है कि 'सोम के साथ लौट।' इसीलिए कहा कि 'तू