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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 375 of 699

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Page 375

का० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० ८-१५ शतपथब्राह्मण / ३५७
यज्ञ को प्रबल बनाता है और न यज्ञ को चंगा करता है। पहला वाक् बोलकर वह सच बोलता
है ॥८॥
वह कहता है—'अग्निर्ब्रह्म' क्योंकि अग्नि ही ब्रह्म है। 'अग्निर्यज्ञः' क्योंकि अग्नि ही
यज्ञ है। 'वनस्पतिर्यज्ञियः' क्योंकि वनस्पतियां ही यज्ञ है। यदि वनस्पतियां न हों तो मनुष्य यज्ञ
कैसे करें ? इसलिए कहा, 'वनस्पतिर्यज्ञियः' ॥९॥
अब वह उसके लिए 'व्रत के भोजन' को पकाते हैं। जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप
हो जाता है, देवों में से एक हो जाता है। देवों का खाना पका होना चाहिए, न कि बे-पका।
इसलिए पकाते हैं। वह इस दूध (व्रत-भोजन) को पीता है, आहुति नहीं देता। वह स्वयं खा लेता
है, और आहुति क्यों नहीं देता इसका कारण यह है—॥१०॥
देवों को जो विजय प्राप्त है वह उन्होंने यज्ञ के द्वारा प्राप्त की है। उन्होंने कहा कि कौन-
सी विधि हो कि इसको मनुष्य न पा जायें ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे शहद की
मक्खियाँ शहद को, और बचे हुए यज्ञ के फोक को यूप के द्वारा बिखेरकर छुप गये। चूंकि इसके
द्वारा यज्ञ के फोक को बिखेरा (अयोपयन्), इसलिए इसका यूप नाम पड़ा ॥११॥
इसको ऋषियों ने सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे वह यज्ञ इकट्ठा किया गया,
उसी प्रकार वह जो दीक्षित होता है यज्ञ ही हो जाता है, क्योंकि यही उसको तानता है और
उत्पन्न करता है। यज्ञ का रस चूस लिया गया था, उस रस से वह फिर यज्ञ को युक्त कर
देता है जब वह व्रत-भोजन (दूध) को पीता है और आहुतियाँ नहीं देता। यदि वह इसकी आहुति
देवे तो यज्ञ को इससे युक्त न कर सके। परन्तु उसको सोचना चाहिए कि मैं आहुति ही दे रहा हूँ
न कि आहुति नहीं दे रहा ॥१२॥
यह प्राण (मनोजाता) मन से ही उत्पन्न हुए हैं। और (मनोयुजः) मन से युक्त और
(दक्ष ऋतवः) ज्ञान से युक्त हैं। अग्नि वाणी है। मित्र और वरुण प्राण और उदान हैं। आदित्य
चक्षु है और सब देव श्रोत्र हैं। इन्हीं देवताओं को वह आहुति देता है (दूध पान करना मानो इन
देवताओं के लिए आहुति देना है) ॥१३॥
कुछ लोग पहले दिन के व्रत-भोज में चावल और जौ मिला लेते हैं। उनका कहना है कि
यज्ञ का जो भाग चूस लिया गया, उसको हम इन दोनों पदार्थों के द्वारा फिर प्राप्त कराते हैं।
और यदि व्रत की गाय दूध न दे तो इन्हीं पदार्थों से व्रत का भोजन बना ले। इस प्रकार चावल
और जौ दोनों अन्वारब्ध हो जाते हैं। लेकिन ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि जो चावल और
जौ दोनों मिलाता है वह न तो यज्ञ को रस से युक्त करता है न उसे चंगा करता है। इसलिए
इनमें से एक ही मिलाना चाहिए। चावल और जौ (दर्शपूर्णमास में तो) हवि के काम में आते
हैं। और उस समय उनका आरब्ध हो ही जाता है। यदि व्रत की गौ दूध न दे तो इन दोनों
पदार्थों में से किसी एक से अपनी इच्छानुसार व्रत-भोज बना ले ॥१४॥
कुछ लोग प्रथम दिवस के व्रत-भोज में सब औषध और सब सुगन्धित पदार्थ मिला लेते