Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 37 of 699

Read in context
Page 37

कां० १, अ० १, ब्रा० ४, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / १६
है, और यह मौन तोड़ने का प्रायश्चित्त भी है। अब जपता है—"देवों की प्रसन्नता के लिए मैं
तुझको लेता हूँ।" वस्तुतः देवों की प्रसन्नता के लिए ही यज्ञ किया जाता है ॥६॥
अब यजु० १।१४ के इस अंश को पढ़कर मूसली पकड़ता है—"तू लकड़ी का बड़ा पत्थर
हैं।" क्योंकि यह लकड़ी का भी है और बड़ा भी। अब इस मन्त्रांश (यजु० १।१४) को पढ़कर
मूसली ऊखली में डालता है—"देवों के लिए हवि तैयार कर। अच्छी तरह तैयार कर।" तात्पर्य
यह है कि इस हवि को देवों के लिए तैयार कर, जल्दी से तैयार कर ॥१०॥
अब वह हविष्कृत् (हवि तैयार करनेवाले) को बुलाता है—"हविष्कृत् आ, हविष्कृत्
आ।" वाणी ही हविष्कृत् है, इस प्रकार वाणी को मुक्त करता है। वाणी यज्ञ है, इस प्रकार वह
यज्ञ को फिर बुलाता है ॥११॥
बुलाने के चार प्रकार हैं—ब्राह्मण को बुलाना हो तो कहेंगे 'एहि', वैश्य के लिए
'आगहि', क्षत्रिय के लिए 'आद्रव', शूद्र के लिए 'आधाव'। इस स्थल पर ब्राह्मणवाला निमंत्रण
देना चाहिए, क्योंकि यही यज्ञ के उपयुक्त है और शान्ततम है। अतः कहता है, 'एहि' (यहाँ
आइये) ॥१२॥
पहली प्रथा यह थी कि इस निमन्त्रण पर यजमान की पत्नी ही उठकर हविष्कृत् बनती
थी। इसलिए यहाँ भी वह (पत्नी) या कोई ऋत्विज उठता है। जब अध्वर्यु हविष्कृत् को बुलाता
है तो एक ऋत्विज दोनों सिलों को पीटता है। ऐसा शोर क्यों करते हैं ? इसलिए कि—॥१३॥
मनु के पास एक बैल था। उसमें असुर को मारनेवाली और शत्रु को मारनेवाली
वाणी घुस गई। जब वह हुङ्कारता और चिल्लाता तो असुर राक्षस मर जाते थे। तब असुरों ने
कहा—"यह बैल तो हमारा बड़ा अनर्थ करता है, इसको कैसे मारें ?" 'असुरों के ऋत्विज थे
'किलात' और 'आकुली' ॥१४॥
ये दोनों बोले—"कहते हैं कि मनु श्रद्धालु है, इसको जांचें।" तब वे मनु के पास गये
और कहा—"हे मनु, हम तुम्हारे लिए यज्ञ करना चाहते हैं।" मनु ने पूछा—'किससे ?' उन्होंने
कहा—"इस बैल से।" उसने कहा-"अच्छा।" बैल के मरने पर वाणी वहाँ से चली गई ॥१५॥
वह मनु की पत्नी मनावी में घुस गई। जब वह उसको बोलते हुए सुनते तो राक्षस
और असुर मर जाते। तब असुरों ने कहा—"यह तो और भी बुरा हुआ, क्योंकि (बैल की अपेक्षा)
मनुष्य अधिक बोलता है।" तब किलात और आकुली ने कहा—"मनु को श्रद्धालु कहते हैं, चलो
इसकी जाँच करें।" वे उसके पास गये और कहा—"हम तुम्हारे लिए यज्ञ करना चाहते हैं।"
मनु ने पूछा—"किससे ?" उन्होंने कहा—"इस तेरी पत्नी से।" उसने कहा—"अस्तु !" उसके
मर जाने पर वाणी उसमें से निकल गई ॥१६॥
अब यह यज्ञ और यज्ञ-पात्रों में घुस गई और वे दोनों (किलात और आकुली) उसको
न निकाल सके। यही असुर और शत्रु को मारनेवाली वाणी इन पत्थरों से निकलती है। जो
इस रहस्य को समझता है, उसके लिए जब यह शोर किया जाता है तो उसके शत्रुओं को बहुत