Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 343 of 699

Read in context
Page 343

कां० २, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ६-६ शतपथब्राह्मण / ३२५
महीनों को जीतता है। तब भी त्र्येनी शलली और तांबे का क्षुरा काम में आता है। उसी से
सिर मुंडवाता है। इस प्रकार ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उसको घेरता है ॥६॥
जब वह साकमेध यज्ञ करता है तो इन्द्र राजा और इन्द्र नेता की सहायता से शेष चार
मासों को जीतता है। तब भी त्र्येनी शलली और तांबे के क्षुरे से मुण्डन होता है और ब्रह्म तथा
तीन विद्याओं की सहायता से उसको घेरता है ॥७॥
जब वह वैश्वदेव यज्ञ करता है तो अग्नि ही हो जाता है और अग्नि के सायुज्य और
सालोक्य को प्राप्त होता है। जब वह वरुण-प्रघास यज्ञ करता है तो वरुण हो जाता है और
वरुण के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है। जब वह साकमेध यज्ञ करता है तो इन्द्र हो
जाता है और इन्द्र के ही सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है ॥८॥
वह जिस ऋतु में परलोक को जाता है वह ऋतु उसको दूसरे ऋतु के हवाले करता है,
और वह अपने से आगेवाले ऋतु के हवाले करता है। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है वह परम धाम
और परम गति को प्राप्त होता है, इसीलिए कहा है कि चातुर्मास्य यज्ञ करनेवाले को कोई नहीं
पाते क्योंकि वह परम धाम और परम गति को प्राप्त हो जाता है ॥६॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका'
भाषा व्याख्या का एकपादिकानाम द्वितीय काण्ड समाप्त हुआ।
द्वितीय—काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [२. २. २] ११४
द्वितीय [२. ३. २] १०३
तृतीय [२. ४. ३] ११३
चतुर्थ [२. ५. ३] ११५
पञ्चम [२. ६. ४] १०४
योग ५४६
पूर्व के काण्ड का ८३८
पूर्णयोग १३८७