शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextका० २, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३२१
इन्हीं के द्वारा दोनों ओर से वरुण के पाश से प्रजा को छुड़ाया। इन्हीं से देवों ने वृत्र को मारा।
इन्हीं से उनको यह विजय मिली जो उनको प्राप्त है। इन्हीं के द्वारा साकमेध यज्ञ करनेवाले
और (वृत्र को) जीतनेवाले देवों की जो श्री थी और जो प्राप्त हुए संवत्सर का रस था, उन
दोनों को ग्रहण करके अपना बना लेता है। इसीलिए इन पाँच हवियों से यज्ञ करता है ॥४॥
अब शुनासीर्य पुरोडाश बारह कपालों का होता है। शुनासीर्य यज्ञ के विषय में पहले कह
ही दिया गया ॥५॥
वायु के लिए दूध की आहुति होती है। प्रजा उत्पन्न होते ही दूध पीती है। वह सोचता
है कि मुझ जीते हुए को प्रजा प्राप्त होवे। श्री, यश, अन्न, मेरा हो। इसलिए दूध की आहुति
होती है ॥६॥
वायु के लिए क्यों आहुति होती है ? यह जो चलता है यह वायु ही तो है। इसी के द्वारा
तो वर्षा होती है। वर्षा से औषध होती हैं। औषध खाकर और जल पीकर ही तो जल में से दूध
होता है। इसलिए (वायु से) ही दूध होता है, इसलिए वायु के लिए आहुति देता है ॥७॥
अब एक कपाल का पुरोडाश सूर्य के लिए। यह सूर्य ही तो है जो तपता है। यही तो
सबकी रक्षा करता है; कभी साधु द्वारा, कभी असाधु द्वारा। यही सबको धारण करता है;
कभी साधु द्वारा, कभी असाधु द्वारा। यह सोचता है कि 'मैं विजयी हो गया। अब वह प्रसन्न
होकर 'साधु' द्वारा मेरी रक्षा करे। साधु द्वारा धारण करे।' इसलिए सूर्य का एक कपाल का
पुरोडाश होता है ॥८॥
इसकी दक्षिणा है सफेद घोड़ा। इसलिए उस तपनेवाले सूर्य के रूप की होती है। यदि
सफेद घोड़ा न मिले तो सफेद गौ ही होवे। इस प्रकार वह तपनेवाले सूर्य के रूप की होती है ॥६॥
जब यह साकमेध यज्ञ करे तभी शुनासीर यज्ञ करे। वर्ष में तीन बार करने से सम्पूर्णता
मिल जाती है। इसलिए कभी कर ले ॥१०॥
कुछ लोग रात्रि को लेना चाहते हैं। यदि वह रात्रि को लेना चाहे तो जब सामने
आकाश में फाल्गुनी पूर्णमासी दिखाई पड़े उस समय शुनासीर यज्ञ को करे ॥११॥
अब वह दीक्षा लेवे कि कहीं फाल्गुनी पूर्णमासी बिना यज्ञ के न रह जाय, क्योंकि यदि
फाल्गुनी पूर्णमासी बिना यज्ञ के गुजर जायगी तो उसको फिर प्रयोग करना पड़ेगा। इसलिए
फाल्गुनी पूर्णमासी बिना सोम यज्ञ के नहीं गुजरनी चाहिए। यह उसके लिए जो (चातुर्मास्य
आहुतियों को) छोड़ बैठता है ॥१२॥
जो (चातुर्मास्य यज्ञ) फिर करना चाहता है, उसे फाल्गुनी पूर्णमासी के पहले दिन
शुनासीर यज्ञ करना चाहिए, दूसरे दिन वैश्वदेव यज्ञ, फिर पौर्णमास यज्ञ। यह उसके लिए है