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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 337 of 699

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Page 337

कां० २, अ० ६, ब्रा० २-३, कं० १७-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ३१६
मिल जाय तो इस मन्त्र से उसमें बांध देता है—"एतत् ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोऽतीहि"
(यजु० ३।६१)—"हे रुद्र! यह तेरा तोशा है। इसे लेकर तू मूजवत के उस पार जा।" तोशा
लेकर ही लोग यात्रा को चलते हैं। इसलिए जहाँ जाना हो वहाँ तोशा लेकर विदा करता है। इस
प्रसंग में उसकी यात्रा मूजवत के उधर है, इसलिए कहता है कि मूजवत के उधर। अब कहता
है—"अवततधन्वा पिनाकावसः" (यजु० ३।६१)—"बिना खिंचे हुए धनुष और वज्र से युक्त ।"
इससे तात्पर्य है 'हिंसा न करते हुए, कल्याण करते हुए जाओ।' अब कहता है— "कृत्तिवासा"
(यजु० ३।६१) "चमड़ा पहने हुए।" इससे वह उसे सुला देता है। सोते हुए कोई किसी को हानि
नहीं पहुँचा सकता। इसलिए कहा 'चमड़ा पहने हुए' ॥१७॥
अब वे दक्षिण की ओर फिरते हैं, बिना पीछे देखते हुए। लौटकर जल का स्पर्श करते
हैं। अब तक रुद्र यज्ञ कर रहे थे। जल शान्ति है। इसलिए शान्तिरुपी जल से अपने को पवित्र
करते हैं ॥१८॥
अब वह केश और दाढ़ी मुंडवाता है, और (उत्तर वेदी की) अग्नि लेता है, क्योंकि
जगह बदलकर ही तो वह (पौर्णमास) यज्ञ कर सकता है। यह ठीक नहीं है कि उत्तर वेदी पर
अग्निहोत्र करे, इसलिए वह जगह बदल लेता है। घर जाकर और अग्नियों का मन्थन करके वह
पौर्णमास यज्ञ करता है। चातुर्मास्य यज्ञ अलग होते हैं, परन्तु पौर्णमास यज्ञ नियत और
प्रतिष्ठित है। इसलिए वह उस नियत यज्ञ को करके अपने को प्रतिष्ठित करता है। इसलिए
जगह बदल देता है ॥१९॥
अध्याय ६-ब्राह्मण ३
जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है उसका पुण्य कभी नाश नहीं होता। वह संवत्सर को जीत
लेता है, इसलिए वह नाश नहीं होता। वह इसके तीन भाग करके यज्ञ करता है। वह इसके तीन
भाग करके जीतता है। 'संवत्सर' का अर्थ है 'सम्पूर्ण'। 'सम्पूर्ण' नाश नहीं होता। इसलिए
उसका सुकृत भी अक्षय होता है। वह ऋतु हो जाता है और देवों को प्राप्त होता है। देवों में तो
'क्षय' है ही नहीं। इसलिए उसके लिए अक्षय सुकृत होता है। यही प्रयोजन है कि वह चातुर्मास्य
यज्ञ करता है ॥१॥
अब शुनासीर यज्ञ क्यों करना चाहिए ? साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय
पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी वह है 'शुनम्' और प्राप्त हुए 'संवत्सर' का जो रस था वह है
'सीर'। साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी और प्राप्त
हुए संवत्सर का जो 'रस' था, उन दोनों को ग्रहण करके अपना बना लेता है, इसलिए 'शुनासीर
यज्ञ' करता है ॥२॥
इसकी यह विधि है - उत्तरवेदी नहीं बनाते। नौनी घी नहीं लेते। अग्नि का मन्थन
नहीं करते। पाँच प्रयाज होते हैं, तीन अनुयाज और एक समिष्ट यजुः ॥३॥
पहले ये साधारण पाँच हवियाँ होती हैं। इन्हीं हवियों से प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की।