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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 325 of 699

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Page 325

कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० १७-२६ शतपथब्राह्मण / ३०७
अब वह जुहू को रखता है और उसके पूर्व को उपभृत को । अब ध्रुवा, पुरोडाश, धान,
मन्थ को रखकर हवियों को छूता है ॥१७॥
ये सब यज्ञोपवीती होकर यजमान और ब्रह्मा इस प्रकार पश्चिम को चलते हैं और
अग्नीध् पूर्व को ॥१८॥
वे इसको धीरे-धीरे करते हैं। पितर भी छिपे हुए हैं और जो धीरे-धीरे पढ़ा जाय वह
भी छिपे के ही समान है। इसलिए धीरे-धीरे ही पढ़ते हैं ॥१९॥
वे इस यज्ञ को घिरे हुए स्थान में करते हैं। पितर छिपे हुए हैं और जो घिरे स्थान में
किया जाता है वह भी छिपे के तुल्य है ॥२०॥
अब वह समिधों को रखकर कहता है, 'जलती हुई आग के लिए कह।' होता एक
सामिधेनी ऋचा को तीन बार पढ़ता है। पितर लोग एक ही बार परलोक को चले गये, इसलिए
एक ही सामिधेनी ऋचा को तीन बार पढ़ता है ॥२१॥
वह जपता है, “उशन्तस्त्वानि धीमहि । उशन्तः समिधीमहि । उशन्नुशत ऽआ वह
पितॄन् हविषेऽअत्तवे' (यजु० १९।७०)- "प्रेम से हम तुझको रखते हैं। प्रेम से तुझे प्रज्वलित
करते हैं। हे प्यारे, प्यारे पितरों को हवि खाने के लिए ला।" अब कहता है, 'अग्नि को ला, सोम
को ला, सोमवन्त पितरों को ला, बर्हिषद् पितरों को ला, अग्निष्वात्ता पितरों को ला, घी पीने-
वाले देवों को ला, होता के लिए अग्नि को ला, अपनी महिमा को ला।' इस प्रकार बुलाकर वह
बैठ जाता है ॥२२॥
अब 'श्रौषट्' करने के पश्चात् वह होता का वरण नहीं करता। यह पितृयज्ञ है। ऐसा
न हो कि होता को पितरों के हवाले कर दे, इसलिए होता का वरण नहीं करता। केवल यह कह-
कर कि, 'होता, बैठ', बैठ जाता है। होता होता-के-आसन पर बैठकर (अध्वर्यु को) प्रेरणा करता
है। प्रेरित होकर अध्वर्यु दो स्रुकों को लेता है और पश्चिम की ओर जाता है। वहाँ जाकर
'श्रौषट्' कहकर कहता है, 'समिधो यज' (समिधों का यज्ञ कर)। बर्हि को छोड़कर चार प्रयाजों
को करता है। बर्हि प्रजा है। ऐसा न हो कि प्रजा पितरों के हवाले हो जाय, इसलिए बर्हि को
छोड़कर चार प्रयाजों को करता है। अब दो आज्य भागों को देते हैं और उनको देकर-॥२३॥
वे अपने जनेऊ को दाहिने कन्धे पर कर लेते हैं क्योंकि इन हवियों को देने की इच्छा कर
रहे हैं। यजमान और ब्रह्मा इस प्रकार करके (पश्चिम से) पूर्व की ओर मुड़ते हैं, और आग्नीध्र
(पूर्व से) पश्चिम की ओर। आगे (अध्वर्यु) श्रौषट् में कहते हैं 'ओ३म् ! स्वधा।' (आग्नीध्र)
उत्तर देता है, 'अस्तु स्वधा।' और वषट्कार है 'स्वधा नमः' ॥२४॥
इस पर आसुरि ने कहा, 'श्रौषट् कहो' और उत्तर में श्रौषट् कहना चाहिए और वषट्-
कार बोलना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि यज्ञ की विधि से हम हट जायें ॥२५॥
तब (अध्वर्यु) कहता है, 'सोमवन्त पितरों को बुलाओ।' सोमवन्त पितरों के लिए
(होता) दो अनुवाक्य बोलता है - एक अनुवाक्य देवों के लिए बोला जाता है और दो पितरों के
लिए। पितर एक बार ही परलोक को सिधार गये, इसलिए पितरों के लिए दो अनुवाक्य
हुए ॥२६॥