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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 323 of 699

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Page 323

का० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ६-१६ शतपथब्राह्मण / ३०५
भाग में छः कपालों को रखता है। दक्षिण दिशा में इसलिए रखते हैं कि दक्षिण दिशा पितरों
की है। इसलिए दक्षिण दिशा की ओर रखते हैं ॥६॥
अब दक्षिणाग्नि के दक्षिण की ओर एक चौकोर वेदि बनाता है, जिसके कोने अवान्तर
दिशाओं की ओर होते हैं। अवान्तर दिशा चार हैं और अवान्तर दिशा ही पितर हैं। इसलिए
वेदि के कोने अवान्तर दिशाओं की ओर होते हैं ॥१०॥
उसके मध्य में अग्नि को रखता है। देव पूर्व से पश्चिम को मनुष्यों तक आये। इसलिए
पूर्व की ओर मुख करके खड़ा होकर आहुति देता है। पितर सभी ओर हैं। अवान्तर दिशा ही
पितर है। इसलिए वह अग्नि को मध्य में रखता है ॥११॥
वहाँ से वह स्तम्बयजु (कुश) को पूर्व की ओर फेंकता है। अब कुशों से वेदी को घेरता
है—पहले इस प्रकार (पश्चिम की ओर), फिर इस प्रकार (उत्तर की ओर); फिर इस प्रकार
(पूर्व की ओर)। पहली लकीर (या पंक्ति) से घेरकर (अध्वर्यु) रेखा खींचता है, और जो
कुछ हटाना होता है उसे हटा देता है। अब वह दूसरी लकीर से घेरता है और दूसरी लकीर से
घेरकर और चिकनाकर कहता है, 'प्रोक्षणी को रख।' अतः वे प्रोक्षणी को रखते हैं। और समिधा
और बर्हि को ये उसके पास रखते हैं। वह स्रुकों को पोंछता है, और घी लेकर आता है। वह
यज्ञोपवीत पहने-पहने ही घी को लेता है ॥१२॥
इस सम्बन्ध में कुछ लोग कहते हैं कि अनुयाज दो होते हैं, इसलिए उपभृति में दो बार
घी ले। परन्तु उसे आठ बार करके घी लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह यज्ञ की विधि से
दूर हो जाय। इसलिए आठ बार करके घी लेवे। घी लेकर और जनेऊ को दाहिने कन्धे पर
करके—॥१३॥
अध्वर्यु प्रोक्षणी लेता है। पहले समिधों पर जल छिड़कता है, फिर वेदी पर। अब वे
बर्हि को उसे देते हैं। और वह बर्हि को पूर्व की ओर गाँठ करके रखता है। अब उस पर जल
छिड़ककर, गाँठ को खोलकर वह गाँठ को पकड़ता है, न कि प्रस्तर को। पितर एक बार ही चले
गये इसलिए वह प्रस्तर को नहीं लेता ॥१४॥
(बर्हि के मुट्ठे को) खोलकर वह दाहिनी ओर से बाईं ओर को तीन बार घूमता है
(वेदि पर) बर्हि को फैलाता हुआ। दाहिनी ओर से बाईं ओर को तीन तहों में फैलाकर वह
इतने कुश बचा लेता है कि प्रस्तर बन सके। अब वह तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को
मुड़ता है। वह तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को इसलिए मुड़ता है कि पहले वह अपने
तीन पितरों के पीछे गया था, अब वह फिर अपने लोक को वापस आ जाता है। इसलिए वह तीन
बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को मुड़ता है ॥१५॥
वह परिधियों को दक्षिण की ओर रखता है। और प्रस्तर को भी दक्षिण की ओर रखता
है। दो विधृतियों को बीच में नहीं रखता। पितर एक बार ही परलोक को सिधार गये, इसलिए
दो विधृतियों को बीच में नहीं रखता ॥१६॥