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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 317 of 699

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Page 317

कां० २, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० १५-२० व १ शतपथब्राह्मण / २६६
जाकर श्रौषट् कहकर कहता है, 'अग्नि॒-स्विष्टकृतं यज।' वषट्कार कहकर आहुति दे देता
हैं ॥१५॥
अब इडा में से काटता है परन्तु आगे का भाग नहीं। (इडा को) कहकर वे (ऋत्विज)
खाते हैं। घर के जितने लोग बची हुई हवि को खानेवाले हों वे खावें, या ऋत्विज लोग खावें।
यदि भात अधिक हो तो अन्य ब्राह्मण भी खावें। जब तक कुम्भी (पात्र) बिल्कुल खाली न होने
पावे उसे ढककर 'पूर्णदर्व' के लिए रख देते हैं। अब गायों के लिए बछड़ों को छोड़ देते हैं। इस
प्रकार पशु भोजन को जाते हैं। उस रात को वह यवागू (जो और गुड़ का मिला हुआ) से अग्नि-
होत्र करता है। प्रातःकाल पितृयज्ञ के लिए निवान्या गौ को (जो गौ दूसरे के बछड़े को पिलाती
है) दुहता है ॥१६॥
इसके बाद, प्रातः के समय, अग्निहोत्र करने के बाद अथवा उससे पहले, जैसा भी वह
चाहे, वे (शेष चरु को) दर्वी चमचे से बिना खाली हुई कुम्भी में से काटता है, यह कहकर (यजु०
३।४६) "पूर्णा दर्व्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत ! वस्नेव विक्रीणावहा ऽइषमूर्ज॒ शतक्रतो।" अर्थात्
"पूर्ण हे दर्वि ! दूर उड़ो। अच्छी तरह पूर्ण, वापस हम तक उड़ो; हे शतक्रतु इन्द्र, वस्ना या
व्यापार वस्तु के समान हम दोनों भोज्य और पेय का मोल-भाव करें।" उसी प्रकार अनुवाक्य
के समान इस ऋचा को कहकर वह उसे (इन्द्र को) भाग के लिए बुलाता है ॥१७॥
अब वह यजमान से कहे, 'बैल को बुलवा।' कुछ लोग कहते हैं कि 'यदि बैल डकारे तो
यह वषट्कार है। इसी वषट्कार के पश्चात् आहुति देनी चाहिए।' इस प्रकार वह वृत्र के वध के
लिए इन्द्र को उसी के रूप में बुलाता है। ऋषभ (बैल) इन्द्र का ही रूप है। इस प्रकार वह वृत्र
के वध के लिए इन्द्र को उसी के रूप में बुलाता है। यदि वह डकारे तो जानना चाहिए कि मेरे
यज्ञ में इन्द्र आ गया, मेरा यज्ञ इन्द्र-युक्त हो गया। और यदि (बैल) न डकारे तो दक्षिण की ओर
बैठा हुआ ब्राह्मण कहे 'जुहुधि' (आहुति दो)। यह वस्तुतः इन्द्र की वाणी है ॥१८॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "देहि मे ददामि ते नि मे धेहि नि ते दधे । निहारं च
हरासि मे निहारं निहराणि ते स्वाहा" (यजु० ३।५०) - "मुझे दे। मैं तुझे देता हूँ। मेरे अर्पण
कर। मैं तेरे अर्पण करता हूँ। मेरे लिए उपहार ला। मैं तेरे लिए उपहार लाऊँ। स्वाहा" ॥१९॥
अब सात कपालों का पुरोडाश खेलनेवाले मरुतों के लिए देता है, क्योंकि जब इन्द्र वृत्र
को मारने के लिए गया तो खेलनेवाले मरुत् उसके चारों ओर खेलते थे और उसकी प्रशंसा करते
थे। ऐसे ही वे यजमान के चारों ओर प्रशंसा करते हुए खेलते हैं। क्योंकि वह अपने दुष्ट और
अहितकर शत्रु को मारने जा रहा है, इसलिए 'खेलनेवाले मरुतों' के लिए आहुति दी जाती है।
इसके पश्चात् महाहविष् होता है। यह उसी प्रकार है जैसे महाहविष् की अलग आहुति दी
जाय ॥२०॥
अध्याय ५-ब्राह्मण ४
देवों ने वृत्र को महाहवि के द्वारा मारा। उसी से उन्होंने वह विजय प्राप्त की जो उनको
मिली हुई है। इसलिए वह अपने पापी, अहितकारी शत्रु को मार डालता और उस पर विजय पा