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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 315 of 699

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Page 315

कां० २, अ० ५, ब्रा० ३, कं० ८-१५ शतपथब्राह्मण / २६७
कहता है, 'सोमं यज।' इसके अनन्तर 'वषट्कार' कहके आहुति देता है ॥८॥
अब कहता है, 'गृहमेधी मरुतों के लिए कह।' दाहिने भात की प्याली के गड्ढे में घी
फैलाता है। उसमें से दो भाग लेकर उन पर घी छोड़ता है और चला आता है। वहाँ आकर
श्रौषट् कहकर कहता है, 'मरुतो गृहमेधिनो यज।' और वषट्कार कहकर आहुति देता है ॥६॥
अब कहता है, 'स्विष्टकृत् अग्नि के लिए कह।' बायें भात के गड्ढे के घी को फैलाता
है और दो भाग लेकर उन पर घी छोड़ता है और चला आता है। आकर 'श्रौषट्' कहकर कहता
है—'अग्ने स्विष्टकृतं यज।' और 'वषट्' कहकर आहुति देता है। अब इडा को काटता है परन्तु
अगला भाग नहीं। इडा कहकर वे अपने को पवित्र कर लेते हैं। यह एक प्रकार है (साकमेध
का) ॥१०॥
अब यह दूसरा। वेदी वही स्तीर्ण रहती है जो 'सांतपन मरुतों' के लिए थी। इसी
आच्छादित वेदी में परिधि और शकलों को रखता है। और (गौओं को उसी तरह) दुहकर चरु
पकाता है। घृत वहीं (?) रखता है। चरु पकाकर घी डालता है, और आग से हटा लेता है।
थाली में घी को निकालता है, स्रुवा और स्रुक् को पोंछता है। चरु को बर्तन में लेकर (वेदी
तक) आता है। फिर थाली में घी लेकर आता है और फिर स्रुवा और स्रुक् को लेकर आता है।
अब वह कुशों से ढकी हुई वेदी को छूता है। और परिधियों को (आहवनीय अग्नि पर) रखता
है और जितने लकड़ी के टुकड़ों को चाहता है रख देता है। अब वह चरुके बर्तन को रख देता है,
घी की थाली को रख देता है, स्रुवा और स्रुक् को रख देता है। होता होता के आसन पर बैठ
जाता है। स्रुवा और स्रुक् को लेकर (अध्वर्यु) कहता है—॥११॥
'अग्नि के लिए कह।' यह अग्नि के आज्य भाग के विषय में। अब थाली में से घी के
चार भाग लेकर (अग्नि के दक्षिण को) जाता है। जाकर और (आग्नीध्र को) श्रौषट् कहकर
(होता से) कहता है, 'अग्निं यज' और वषट्कार कहकर आहुति डालता है ॥१२॥
अब वह कहता है, 'सोम के लिए कह।' यह सोम को आज्यभाग के सम्बन्ध में कहा।
अब प्याली में से चार भाग लेकर जाता है। जाकर श्रौषट् कहकर कहता है 'सोमं यज' और
वषट्कार के पश्चात् आहुति देता है ॥१३॥
अब कहता है, 'गृहमेधी मरुतों के लिए कह'। अब वह (जुहू में) घी को फैलाता है।
चरु में से दो भाग काटता है। उस पर घी डालता है। फिर दो भागों को चुपड़ता है और (वेदी
तक) जाता है। जाकर और श्रौषट् कहकर कहता है, 'मरुतो गृहमेधिनो यज' और वषट्कार
कहकर आहुति देता है ॥१४॥
अब कहता है, 'अग्निस्विष्टकृत के लिए कह।' अब वह घी को फैलाता है, चरु में से एक
टुकड़ा लेता है और दो बार घी छोड़ता है, और दोनों टुकड़ों को बिना चुपड़े हुए जाता है।