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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 311

कां० २, अ० ५, ब्रा० २-३, कं० ४२-४८ व १ शतपथब्राह्मण / २६३
| लिए।' अब होता सूक्तवाक् कहता है। इस पर दोनों प्रस्तरों को लेकर (आग में) डाल देते हैं।
दोनों एक तृण लेकर (आग के पास) बैठे रहते हैं। अब होता सूक्तवाक् को कहता है ॥४२॥
आग्नीध्र कहता है, 'अनुप्रहर (डाल)।' दोनों डालते हैं और अपने शरीर का स्पर्श
करते हैं ॥४३॥
अब आग्नीध्र कहता है, '(मुझसे) संवाद कर।' अध्वर्यु कहता है, 'आग्नीध् ! क्या वह
गया ?' 'हाँ वह गया।' 'यहाँ देवताओं को सुनाओ।' 'वे सुनें।' 'दैवी-होता विदा हों। मनुष्य-
होता का कल्याण हो।' अब अध्वर्यु होता से कहता है, 'शान्ति कह।' वे दोनों परिधियों को फेंक
देते हैं, और दोनों स्रुचों को मिलाकर स्फ्य पर रख देते हैं ॥४४॥
अब अध्वर्यु (गार्हपत्य अग्नि के पास) लौटकर 'पत्नी संयाज' करता है। प्रतिप्रस्थाता
ठहरा रहता है। अध्वर्यु पत्नी-संयाज करके उत्तर की ओर चला जाता है ॥४५॥
अब अध्वर्यु तीन समिष्ट-यजुष् की आहुति देता है। प्रतिप्रस्थाता स्रुच लेकर मौन होकर
आहुति देता है। यजमान और पत्नी ने जो वस्त्र वैश्वदेव के समय पहने थे वे अब भी पहनें।
अब वरुण की पयस्या के जले भाग को लेकर अवभृथ अर्थात् स्नान के स्थान में आवें। यह
(स्नान) वरुण के लिए है जिसके पाश से छूट जाय। वहाँ साम नहीं गाया जाता क्योंकि साम से
तो कुछ किया नहीं जाता। अध्वर्यु चुपके से वहाँ जाकर (जले भाग के पात्र को) जल में डुबो
देता है ॥४६॥
अब वह कहता है, "अवभृथ निचुम्पुण निचेरुरसि निचुम्पुणः। अव देवैर्देवकृतमेनोऽया-
सिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि" (यजु० ३।४८) — "हे धीरे चलनेवाले जलाशय,
तू चुपके-चुपके चलता है। देवों की सहायता से इन देव-कृत पापों से छूट जाऊँ और मनुष्यों की
सहायता से मनुष्य-कृत पापों से। हे देव, मुझे राक्षस से बचा।" (स्नान के समय के वस्त्रों को)
मन चाहे किसी (पुरोहित) को दे देवे, क्योंकि ये वस्त्र दीक्षित पुरुष के तो होते ही नहीं। जैसे
साँप केंचुल छोड़ता है, इसी प्रकार यह पापों को छोड़ता है ॥४७॥
अब यजमान के बाल और दाढ़ी बनाते हैं। अब दोनों अग्नियों को लेते हैं, क्योंकि जगह
बदलकर ही दूसरा यज्ञ होता है। उत्तर वेदी पर अग्निहोत्र करना ठीक नहीं। अब घर जाकर
अग्नि मथकर वह पूर्णमासी का यज्ञ करता है। यह चातुर्मास्य यज्ञ अलग है, पूर्णमासी का निश्चित
यज्ञ है। इसलिए वह निश्चित यज्ञ द्वारा अपने को स्थापित कर लेता है। इसीलिए वह जगह
बदलता है ॥४८॥ (वर्षाकाल का वरुण-प्रघास पर्व समाप्त)
अध्याय ५—ब्राह्मण ३
वरुण-प्रघास के द्वारा प्रजापति ने प्रजा को वरुण के जाल से छुड़ाया, और प्रजा रोग-
रहित और दोषरहित उत्पन्न हुई। और इन 'साकमेध' आहुतियों के द्वारा देवों ने वृत्र को मारा
और उस विजय को प्राप्त किया जिसको वे इस समय भोग रहे हैं। उसी प्रकार यह (यजमान)
भी अपने पापी शत्रुओं और अहितैषियों को मारता है और उन पर विजयी होता है। इसीलिए