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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 305 of 699

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Page 305

कां २, अ० ५, ब्रा० २, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / २८७
सजोषसः” (यजु० ३।४४)—“प्रघास और करम्भ नामी हवियों को खूब खानेवाले और इन
शत्रुओं का नाश करनेवाले मरुतों को हम बुलाते हैं।” यह अनुवाक्य है। इससे वह मरुतों को
पात्रों तक बुलाती है ॥२१॥
हर एक के लिए एक-एक पात्र होता है। जितने घर के लोग होते हैं उतने ही पात्र होते
हैं और एक अधिक। एक-एक पुरुष के लिए एक-एक इसलिये होता है कि जो प्रजा उत्पन्न हुई है
वह वरुण के पाश से छूट जाय। जो एक पात्र बच रहा वह इसलिये कि उससे जो सन्तान अभी
उत्पन्न नहीं हुई वह वरुण के पाश से छूट जाय। इसलिये एक पात्र अधिक होता है ॥२२॥
पात्र इसलिए होते हैं कि पात्रों में ही खाना खाते हैं। जौ के इसलिए बनाये जाते हैं
क्योंकि जब प्रजा ने जौ खाये तभी वरुण ने उनको पकड़ा। शूर्प (छाज) से आहुति देते हैं कि
शूर्प (छाज) से ही भोजन तैयार किया जाता है। (पति के साथ) पत्नी भी आहुति देती है
क्योंकि जोड़े द्वारा ही वरुण के पाश से प्रजा को छुड़ाता है ॥२३॥
यज्ञ से पूर्व, आहुति से पूर्व ही इसलिए अर्पण करती है क्योंकि लोग (विश) आहुतियों
को नहीं खाते और मरुत् लोग (विश) हैं। जब प्रजापति की प्रजा को वरुण ने पकड़ लिया और
विदीर्ण कर दिया और वह श्वास-प्रश्वास लेते हुए लेट गये और बैठ गये, तब उनके पापों को
मरुतों ने ही दूर किया था। इसी प्रकार इस यजमान की सन्तान का पाप भी मरुत् ही दूर करते
हैं, इसलिए यज्ञ के पहले ही और आहुतियों से ही अर्पण करती है ॥२४॥
वह दक्षिण-अग्नि में आहुति देता है यह पढ़कर, “यद् ग्रामे यदरण्ये” (यजु० ३।४५)—
“जो (पाप) गाँव में किया और जो वन में।” पाप गाँव में भी होता है और वन में भी। फिर
कहता है —“यत् सभायां यदिन्द्रिये।” (यजु० ३।४५) अर्थात् “जो पाप सभा में किया और
जो इन्द्रिय (अपने) में।’ ‘सभा में’ का अर्थ है मनुष्यों के प्रति, ‘इन्द्रिय में’ का अर्थ है देवताओं
के प्रति । अब कहता है—“यदेनश्चकृमा वयमिदं तदवयजामहे स्वाहा।” (यजु० ३।४५)—“जो
कुछ पाप हमने किया उसके लिए हम यज्ञ करते हैं।” तात्पर्य यह है कि जो कुछ पाप हमने किया
उस सबसे हम छुटकारा पाते हैं ॥२५॥
अब इन्द्र और मरुत् का मन्त्र पढ़ता है। जब प्रजापति की प्रजाओं का मरुतों ने पाप
छुड़ाया तो उसने सोचा, 'ये मेरी प्रजा का नाश न करेंगे' ॥२६॥
उसने इन्द्र और मरुत् के मन्त्र को पढ़ा। इन्द्र क्षत्रिय है और मरुत् वैश्य (या साधारण
लोग)। क्षत्रिय ही लोगों को वश में करनेवाले हैं। इन्द्र के मन्त्र को इसलिए पढ़ता है कि वह
लोगों को वश में कर लेगा ॥२७॥
“मो षू णऽ इन्द्राऽत्र पृत्सु देवैरस्ति हि ष्मा ते शुष्मिन्नवयाः। महश्चिद् यस्य मीढुषो यव्या
हविष्मतो मरुतो वन्दते गीः” (यजु० ३।४६)—“हे इन्द्र, युद्धों में हमारा देवों के साथ (झगड़ा)
न हो। हे बलवान् ! तेरे लिए यज्ञ में भाग है। हे बहुत बड़े दान की वर्षा करनेवाले, यजमान
की स्तुति तेरे जौ के द्वारा पूज्य मरुतों की प्रशंसा करती है ॥२८॥
अब वह (पत्नी से) कहलवाता है—“अक्रन् कर्म कर्मकृते” (यजु० ३।४७)—“कर्म के
कुशल लोगों ने कर्म कर लिया।” कर्म-कुशल लोगों ने कर्म कर ही लिया। अब कहता है—“सह
वाचा मयो भुवा” (यजु० ३।४७)—“हर्ष-पूर्ण वाणी के साथ।” उन्होंने वाणी के साथ कर्म
किया (अर्थात् मन्त्र पढ़ते हुए)। अब कहती है—“देवेभ्यः कर्म कृत्वा।” (यजु० ३।४७)—
“देवों के लिए कर्म करके।” क्योंकि देवों के लिए ही तो कर्म किया गया। अब कहती है, “अस्तं
प्रेत सचाभुवः (यजु० ३।४७)—'हे साथियो ! घर जाओ।” ‘सचाभुवः’ इसलिए कहा कि वे
दूसरी जगह से लाई गईं और अब वे उसके साथ हैं। वह कहती है, “अस्तं प्रेत” (घर जाओ);