Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 299 of 699

Read in context
Page 299

कां० २, अ० ५, ब्रा० १-२, कं० १७-२२ व १-३ शतपथब्राह्मण / २८१
में रखे हुए हैं। जो कोई इन आहुतियों से कोई आहुति देता है वह प्रजा को उत्पन्न करके द्यौ
और पृथिवी के बीच में रख देता है। इसलिये द्यावापृथिवी का एक कपाल होता है ॥१७॥
अब इसके पीछे कार्यक्रम कहते हैं। उत्तर-वेदि नहीं बनाते जिससे यह परिमित न हो;
पूर्ण हो और विश्वेदेवों की हो । बर्हि को तीन गट्ठों में बाँधते हैं, फिर एक में कर लेते हैं। उत्पत्ति
का यही रूप है। माता-पिता दो होते हैं। जो सन्तान उत्पन्न होती है वह तीसरी होती है।
इसलिये जो त्रित्व है वह पीछे से एक हो जाता है। बर्हि के फूले हुए सिरे (प्रस्वः) बँधे होते हैं।
उनको वह प्रस्तर के रूप में ग्रहण करता है, क्योंकि यह जलनेवाला संयोग है। फूले हुए
बर्हि उत्पन्न करनेवाले होते हैं। यही कारण है कि वह फूले हुए कुशों को प्रस्तर के रूप में ग्रहण
करता है ॥१८॥
हवियों को रखकर अग्नि को मथता है। अग्नि के उत्पन्न होने के पश्चात् ही प्रजापति
की प्रजा हुई। इसी प्रकार इस यजमान के भी अग्नि के उत्पन्न होने पर ही प्रजा होगी। यही
कारण है कि वह हवियों को रखने के पश्चात् अग्नि का मन्थन करते हैं ॥१९॥
नौ प्रयाज होते हैं और नौ अनुयाज । विराट् छन्द में दस अक्षर होते हैं। इसलिये वह
दोनों बार विराट् से न्यून (दस से कम नौ बार) ही जनने के लिए लेता है। क्योंकि प्रजापति ने
न्यून प्रजनन से ही दो बार उत्पत्ति की, ऊपर की ओर और नीचे की ओर, इसलिए नौ प्रयाज
होते हैं और नौ अनुयाज ॥२०॥
तीन समिष्ट-यजुष् होते हैं, क्योंकि यह हविर्यज्ञ से बड़ा होता है, क्योंकि इसमें नौ
प्रयाज होते हैं और नौ अनुयाज । समिष्ट-यजुष् एक भी हो सकता है; तब यह हविर्यज्ञ ही होता
है। इसकी दक्षिणा पहलौटी गौ होती है ॥२१॥
जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है, उसको वही प्रजा उत्पन्न होती है
और वही श्री प्राप्त होती है जो प्रजापति के यज्ञ करने से प्रजा उत्पन्न हुई और श्री उसको प्राप्त
हुई ॥२२॥
अध्याय ५-ब्राह्मण २
प्रजापति ने वैश्वदेव यज्ञ करके ही प्रजा उत्पन्न की। वह उससे उत्पन्न हुई प्रजा वरुण
के जौ को खा गई। जौ पहले वरुण का ही था। चूंकि उन्होंने वरुण के जौ खाये, इसलिये इस यज्ञ
का नाम 'वरुण प्राघास' पड़ा ॥१॥
वरुण ने उनको पकड़ लिया। वरुण से पकड़े जाकर वे सूज गये, और वे लेट गये तथा
साँस बाहर-भीतर लेते हुए बैठे रहे। केवल प्राण और उदान ने उनको न छोड़ा; और सब देवता
छोड़ गये, और इन्हीं दो के कारण प्रजा मरी नहीं ॥२॥
प्रजापति ने इस हवि के द्वारा उनको चंगा किया। और जो प्रजा उत्पन्न हो चुकी थी
और जो अभी उत्पन्न नहीं हुई थी, उस सबको वरुण के जाल से मुक्त कर दिया, और उसकी