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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 297 of 699

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Page 297

कां० २, अ० ५, ब्रा० १, कं० ९-१७ शतपथब्राह्मणं / २७६
अग्नि उस सोम या वीर्य को सींचता है। इस प्रकार उत्पादक जोड़ा होता है ॥९॥
अब आठ या बारह कपालों में सविता के लिए पुरोडाश होता है। सविता देवों का प्रेरक
है। वह प्रजापति है। बीच का जनक है। इसलिये पुरोडाश होता है ॥१०॥
अब सरस्वती के लिए चरु आता है, और एक चरु पूषा के लिए। सरस्वती स्त्री है और
पूषा पुरुष। इस प्रकार जननेवाला जोड़ा मिल गया। इस प्रकार दो प्रकार के जोड़ों के मिलने से
प्रजापति ने प्रजा को उत्पन्न किया-एक से ऊपर की और एक से नीचे की। इसलिये इनके पाँच
हवियाँ होती हैं (अर्थात् १. अग्नि का पुरोडाश, २. सोम का चरु, ३. सविता का पुरोडाश,
४. सरस्वती की चरु, ५. पूषा का चरु) ॥११॥
अब इसके पश्चात् पयस्या का आयतन एवं मरुत् का सात कपालों का पुरोडाश। मरुत्
हैं वैश्य अर्थात् देवों के आदमी। वे स्वतन्त्र फिरते थे। जब प्रजापति यज्ञ कर रहा था तो उन्होंने
उसके पास जाकर कहा—'तू इस यज्ञ के द्वारा जो प्रजा उत्पन्न करेगा, उसे हम नष्ट कर
डालेंगे' ॥१२॥
प्रजापति ने सोचा कि मेरी पहली प्रजाजायें तो मर चुकीं। यदि (मरुत्) इस प्रजा को भी
मार डालेंगे, तो कुछ न बचेगा। इसलिये उसने उनके लिए अलग भाग रख दिया, अर्थात् सात
कपालों में मरुत् के लिए पुरोडाश। ये सात कपाल इसलिए होते हैं कि मरुत् लोगों के सात-
सात के गण* होते हैं। इसलिये मरुतों के सात कपाल होते हैं ॥१३॥
'स्वतवोभ्यः' (अपने स्वत्व को बढ़ानेवालों के लिए) ऐसा कहकर आहुति देनी चाहिए,
क्योंकि उन्होंने अपने स्वत्व को ले लिया। परन्तु यदि याज्ञिकों को याज्य-अनुवाक्य न मिले तो
केवल 'मरुतों के लिए' ऐसा कर देवें। यह प्रजा की अहिंसा के लिए किया जाता है, इसलिये
मरुतों के लिए होता है ॥१४॥
अब इसके बाद पयस्या की आहुति। दूध से ही प्रजाएँ पलती हैं, दूध से ही प्रजाएँ पली
थीं। इसलिये वह अब उनके लिए उसी की आहुति देता है जिसके द्वारा वे पली थीं। जिसको
प्रजापति ने पहली हवियों से उत्पन्न किया, वे दूध से ही पलती हैं अर्थात् उसी पयस्या
से ॥१५॥
इसमें जोड़ा हो जाता है। पयस्या स्त्री है और मट्ठा वीर्य है। इसी जोड़े से क्रमानुसार
अनन्त विश्व उत्पन्न हुआ। और चूंकि इस जोड़े से विश्वदेव उत्पन्न हुआ इसलिए इसको 'वैश्व-
देवी' अर्थात् सब देवों की आहुति कहते हैं ॥१६॥
अब एक कपाल पर द्यावापृथिवी की आहुति होती है। इन्हीं हवियों से प्रजापति ने प्रजा
को उत्पन्न करके द्यौ और पृथिवी के बीच में रख दिया, इसलिये ये द्यौ और पृथिवी के बीच

  • त्रिः षष्टिरत्वा मरुतो वावृधाना उस्रा इव राशयो यज्ञियासः। उप त्वेमः कृधि नो भागधेय
    शुष्मं त एना हविषा विधेम (ऋ० ८।६६।८)। यहाँ ६३ मरुत् हैं। उनके सात-सात के नौ
    गण हुए।