शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० २, अ० ४, ब्रा० ४-५, कं० १८-२५ व १ शतपथब्राह्मण / २७५
अब अग्नि का पुरोडाश इसीलिए है कि अग्नि यज्ञ को छोड़कर न चला जाय। मित्र और वरुण
अर्धमास हैं। बढ़ता हुआ वरुण है और घटता हुआ मित्र । उस (अमावस्या की) रात्रि को वे
दोनों मिलते हैं। और जब वे मिलते हैं तब (यजमान) दोनों को प्रसन्न करता है। जो इस
रहस्य को समझता है सब उससे प्रसन्न रहते हैं और उसको सब-कुछ प्राप्त होता है ॥१८॥
उसी रात को मित्र वरुण में वीर्य सींचता है। और जब यह (चन्द्र) घटता है तो फिर
उसी वीर्य से उत्पन्न होता है। यह जो मित्र और वरुण की पयस्या (दही) है, वह (सान्नाय्य के)
समान है ॥१९॥
अमावस्या सान्नाय्य के ही योग्य है। यह (अमावस्या को भी) और पूर्णमासी को भी
तैयार किया जाता है। अब यदि वह यहाँ भी (अर्थात् पूर्णमासी को भी) सान्नाय्य बनावे तो
दुहराने के दोष का भागी हो और देवताओं में झगड़ा हो जाय। इस (सोम) को जलों और
ओषधियों से इकट्ठा करके आहुतियों में होकर उत्पन्न करता है। और यह (सोम या चाँद)
आहुतियों से उत्पन्न होकर पश्चिम की ओर चमकता है ॥२०॥
इसको जोड़े से उत्पन्न करता है। पयस्या स्त्री है और मट्ठा वीर्य है। जो जोड़े से उत्पन्न
होता है वह ठीक होता है। इसलिए वह इसको जोड़े से उत्पन्न करता है और इसीलिए यहाँ
पयस्या तैयार की जाती है ॥२१॥
अब मट्ठे की आहुति दोनों घोड़ों (वाजियों) के लिए दी जाती है। घोड़े (वाजी) ऋतुएँ
हैं और (वाजी) मट्ठा वीर्य है। यह वीर्य अनुष्ठान से सींचा जाता है। सींचे हुए वीर्य से ऋतुएँ
इन प्रजाओं को उत्पन्न करती हैं। इसीलिए 'बाजी' घोड़े के लिए 'वाजी' मट्ठे की आहुति देता
है। ('वाजी' घोड़े को भी कहते हैं और मट्ठे को भी) ॥२२॥
वह यज्ञ के पीछे की ओर से आहुति देता है। पीछे की ओर से ही पुरुष स्त्री के पास
जाता और वीर्य-सिंचन करता है। वह पहले पूर्व की ओर आहुति देता है। 'अग्ने वीहि' (हे अग्नि,
स्वीकार करो) यह पढ़कर वषट्कार को दुहराता है। यह स्विष्टकृत् के बदले में है। इसको पूर्व
की ओर देता है ॥२३॥
अब वह इस मन्त्र से दिशाओं के लिए आहुति देता है—'दिशः प्रदिशऽआदिशो विदिश-
ऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा' (यजु० ६।१९)। पाँच दिशाएँ हैं और पांच ऋतुएँ। इस प्रकार दिशाओं
का जोड़ा मिलाता है ॥२४॥
(चमसे में जो मट्ठा बच रहता है उसे) पाँच लोग चखते हैं—होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा,
आग्नीध्र और यजमान। पाँच ही तो ऋतुएँ हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं का तद्रूप हो जाता है।
और जो वीर्य सींचा जाता है वह प्रतिष्ठित हो जाता है। यजमान (यह सोचते हुए) पहले चखता
है कि मुझे पहले वीर्य की प्राप्ति हो। और वह पीछे भी चखता है कि मुझमें वीर्य अन्त तक रहे।
'उपहूत उपह्वयस्व' कहकर वह इस (मट्ठे) को मोम बना लेता है ॥२५॥
चातुर्मास्यानि
अध्याय ५—ब्राह्मण १
पहले केवल प्रजापति ही था। उसने सोचा कि कैसे प्रजा उत्पन्न करूँ.? उसने श्रम किया
और तप तप। उसने प्रजा उत्पन्न की। वह उत्पन्न हुई प्रजा गुजर गई। यह वे पक्षी हैं। पुरुष