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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 287 of 699

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Page 287

का० २, अ० ४, ब्रा० ३-४, कं० १०-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / २६६
तो चाहे दस बार उलट जाय कुछ परवाह नहीं। और यदि कोई कहे कि इन (दोषों) के भार
को कौन सहे तो केवल घी की ही आहुति दे, क्योंकि इन द्यावा-पृथिवी का प्रत्यक्ष रस घी है। इस
प्रकार प्रत्यक्ष रूप में इनको वह इन्हीं के रस या मेध (तत्त्व) से तृप्त करता है, इसलिए घी की
ही आहुति दे ॥१०॥
यज्ञ करके देवों ने उन सब ओषधियों को, जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं या पशु रहते हैं,
(असुरों की) चालाकी और विष (के प्रभाव) से मुक्त कर दिया। इसलिए अब मनुष्य भोजन
करने लगे और पशु चरने लगे ॥११॥
अब वह जो यज्ञ करता है, या तो इसलिए करता है कि कोई चालाकी या विष से
(वनस्पति) को बिगाड़ने न पाये, या केवल इसलिए कि देवों ने ऐसा किया था। और जो भाग
देवों ने अपने लिए निकाला था वह भी उनके लिए निकाल देता है। इसके अतिरिक्त वह दोनों
प्रकार के पौधों को अर्थात् जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं और जिनके सहारे पशु रहते हैं, उनको
विषरहित कर देता है और ये मनुष्य और पशु इसके दोष-रहित पौधों के सहारे जीते हैं।
इसलिए वह इस यज्ञ को करता है ॥१२॥
इस यज्ञ की दक्षिणा है पहलोटी बछड़ा, क्योंकि यह (गाय का) अग्र अर्थात् पहला फल
होता है। यदि दर्श और पूर्णमास यज्ञ कर चुका हो तो पहले वह आहुतियां दे और फिर इस यज्ञ
को पीछे से करे। और यदि (दर्श और पूर्णमास) नहीं किया तो अन्वाहार्य-पचन अग्नि पर
चातुष्प्राश्य को पका ले और ब्राह्मणों को खिला दे ॥१३॥
देव दो प्रकार के हैं - एक तो देव; और दूसरे ब्राह्मण जो वेदपाठी हैं, ये मनुष्य-देव हैं।
जिस प्रकार वषट्कार की आहुति होती है वैसी यह भी है। इस समय भी वह जितना हो सके
उतनी दक्षिणा दे, क्योंकि कहते हैं कि कोई हवि दक्षिणा के बिना पूरी नहीं होती। अग्निहोत्र में
(नया अन्न) न डाले, नहीं तो झगड़ा होगा। आग्रयण भिन्न है और अग्निहोत्र भिन्न। इसलिए
अग्निहोत्र में (नया अन्न) न डाले ॥१४॥
अध्याय ४-ब्राह्मण ४
प्रजापति ने पहले प्रजा की कामना से यह यज्ञ किया। उसने सोचा- 'मैं बहुत प्रजा और
पशु-युक्त हो जाऊँ, श्री मिल जाय, यशस्वी हो जाऊँ, अन्न पचानेवाला हो जाऊँ' ॥१॥
उसका नाम दक्ष था। और चूंकि पहले उसने इस यज्ञ को किया, इसलिए यज्ञ का
'दाक्षायण यज्ञ' नाम पड़ा। कुछ लोग दक्ष को वसिष्ठ-यज्ञ कहते हैं, क्योंकि वह वसिष्ठ ही है।
उसी के नाम पर यज्ञ का नाम पड़ा। उसने यज्ञ किया और इस यज्ञ से उस प्रजापति ने जो
सन्तान, जो श्री, जो विभूति प्राप्त की उसी सन्तान, उसी श्री को वह भी प्राप्त होता है जो इस