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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 275 of 699

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Page 275

कां० २, अ० ३-४, ब्रा० ४-१, कं० ३७-४१ व १-५ शतपथब्राह्मण / २५७
यहाँ कहा 'नाध्वसु वारणेषु (भयानक मार्गों में)' क्योंकि द्यौ और पृथिवी के बीच के मार्ग
भयानक हैं। इन्हीं मार्गों में उसको चलना है। इसलिए कहता है 'भयानक मार्गों में' ॥३७॥
अब इन्द्र की स्तुति है। इन्द्र ही यज्ञ का देवता है। इसलिए इन्द्र से ही अग्नि के उपस्थान
को सम्बद्ध करता है, "कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे" (यजु० ३।३४)- "हे इन्द्र ! तू
कभी रिक्त (barren) नहीं, और कभी अपने सेवक को विफल नहीं करता।" 'दाशुषे' का
तात्पर्य है यजमान । 'तू यजमान से कभी द्रोह नहीं करता' इस मन्त्र के पढ़ने से यही तात्पर्य है।
अब कहता है, "उपोषेन्नु मघवन् भूयऽ इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते" (यजु० ३।३४)-'हे मघवन्,
तुझ देव का दान अधिक ही होता जाता है।" इसका तात्पर्य यह है कि हमको यहाँ अधिक पुष्ट
कर ॥३८॥
अब सावित्री का जाप है। सविता देवों का प्रेरक है। सविता की प्रेरणा से ही सब काम
सफल होते हैं। इसलिए कहा "तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्'
(यजु० ३।३५) ॥३९॥
अब अग्नि के लिए एक मन्त्र है। अपने को अन्त में रक्षार्थ अग्नि के ही समर्पण करता
है, "परि ते दूडभो रथोऽस्माँऽ अश्नोतु विश्वतः । येन रक्षसि दाशुषः" (यजु० ३।३६)-"तेरा
अवध्य रथ हमको चारों ओर से ढक ले जिससे तू पूजकों की रक्षा करता है।" 'दाशुषः' का अर्थ
है यजमान । और अग्नि के पास जो अवध्य रथ है उससे वह यजमानों की रक्षा करता है। इस
कहने का तात्पर्य है कि 'हे अग्नि, जो अवध्य रथ तेरे पास है और जिससे तू यजमानों की रक्षा
किया करता है, उससे हर ओर से हमारी रक्षा कर।' तीन बार इसको जपता है ॥४०॥
अब वह अपने पुत्र का नाम लेता है- 'मेरा यह लड़का (नाम लेकर) मेरे इस एक क्रम
को जारी रखे।' यदि उसके पुत्र न हो तो अपना ही नाम ले ले ॥४१॥
अध्याय ४ - ब्राह्मण १
अग्निहोत्र के पश्चात् वह अग्नि को 'भूर्भुवः स्वः' (यजु० ३।३७) कहकर प्रार्थना करता
है। ऐसा कहकर वह अपनी वाणी को सत्य से पवित्र करता है, और वाणी को पवित्र करके
आशीर्वाद माँगता है- "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याँ७" (यजु० ३।३७) अर्थात् "मैं अच्छी सन्तान-
वाला होऊँ।" इससे सन्तान को चाहता है। "सुवीरो वीरैः" (यजु० ३।३७), इससे वीरों को
चाहता है। "सुपोषः पोषैः" (यजु० ३।३७), इससे पुष्टि चाहता है ॥१॥
वह बड़ी प्रार्थना भी आशीर्वाद थी और यह छोटी प्रार्थना भी उसी के लिए। इसलिए
इससे भी वह सबको प्राप्त करता है, इसलिए वह यह प्रार्थना करे। असुरि का कथन है, 'हम इसी
से (अग्निहोत्र) करें' ॥२॥
यदि प्रवास (यात्रा) करना हो तो पहले गार्हपत्य में जावे, फिर आहवनीय में ॥३॥
प्रजापति के पास जाकर कहे, "नर्य प्रजां मे पाहि" (यजु० ३।३७)- "हे नरों के मित्र,
मेरी सन्तान की रक्षा कर।" (गार्हपत्य अग्नि) प्रजा का अधिष्ठाता है, इसलिए रक्षा के लिए
वह प्रजा को उसी के सुपुर्द कर जाता है ॥४॥
अब आहवनीय के पास जाकर कहता है, "शँस्य पशून् मे पाहि" (यजु० ३।३७) -