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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 253 of 699

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Page 253

कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १६-३० शतपथब्राह्मण / २३५
इससे पितर और ओषधियाँ (यज्ञ में) सम्मिलित हैं। यह जो आहुति देकर खाता है वह मनुष्यों
के लिए आहुति देता है। इससे (मनुष्य यज्ञ में) सम्मिलित होते हैं ॥१९॥
जो यज्ञ में सम्मिलित नहीं किये जाते वे तिरस्कृत हैं। इस प्रकार जो प्रजा तिरस्कृत
नहीं है उसके लिए यज्ञ के आरम्भ में ही भाग निकल जाता है। इस प्रकार पशु (मनुष्यों के)
साथ-साथ भाग लेते हैं क्योंकि पशु मनुष्यों के पीछे चलनेवाले हैं ॥२०॥
इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि इस (अग्निहोत्र) को हविर्यज्ञ नहीं मानना चाहिए।
इसको तो पाकयज्ञ (Domestic Sacrifice) कहना चाहिए, क्योंकि हविर्यज्ञ में जो कुछ स्रुक्
में लिया जाता है वह सब अग्नि में छोड़ दिया जाता है। और यहाँ अग्नि में आहुति देने के पश्चात्
आचमन करता और खाता है। यह सब पाकयज्ञ की ही क्रिया है। यह यज्ञ का पाशविक रूप है
क्योंकि पाकयज्ञ पाशविक है ॥२१॥
पहली एक आहुति वही है जिसको प्रजापति ने दिया था और जिसके पीछे देवों ने (यज्ञ)
जारी रक्खा अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य ने। इसलिए यह दूसरी आहुति देता है ॥२२॥
वह जो पूर्वाहुति दी गई वह तो अग्निहोत्र का देवता है, इसलिए उसी के लिए दी जाती
है। और जो दूसरी आहुति है वह स्विष्टकृत् के समान है, इसलिए वह उत्तर की ओर दी जाती
है। (उत्तरा आहुति उत्तर की ओर दी जाने से शब्दों का सादृश्य है), क्योंकि स्विष्टकृत् की यही
दिशा है। यह दूसरी आहुति जोड़ा बनाने के लिए दी जाती है, क्योंकि जोड़े से ही सन्तान
उत्पन्न होती है ॥२३॥
ये दोनों आहुतियाँ दो का जोड़ हैं—भूत और भविष्य का और उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न
होनेवाले का, जो है और जिसकी आशा है उन दोनों का, आज का और कल का ॥२४॥
आत्मा ही भूत है। भूत निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। भविष्यत् प्रजा है।
भविष्यत् अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२५॥
जो उत्पन्न हो गया वह आत्मा है, क्योंकि जो उत्पन्न हो गया वह निश्चित है और आत्मा
भी निश्चित है। जो उत्पन्न होनेवाला है वह प्रजा है, क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला है वह अनिश्चित
है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२६॥
जो प्राप्त हो गया (आगत, actual) वही आत्मा है, क्योंकि जो प्राप्त हो गया वह
निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। आशा प्रजा है क्योंकि प्रजा भी अनिश्चित है और आशा
भी अनिश्चित है ॥२७॥
आत्मा आज है, क्योंकि आज भी निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। कल प्रजा
है क्योंकि कल भी अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२८॥
यह जो पूर्वाहुति है वह आत्मा के लिए दी जाती हैं। यह मन्त्र से दी जाती है, क्योंकि
मन्त्र निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। दूसरी प्रजा के लिए दी जाती है। वह मौन होकर
दी जाती है, क्योंकि मौन अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२९॥
(सायंकाल की) आहुति इस मन्त्र से दी जाती है—"अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा"
(यजु० ३।६), और प्रातःकाल इस मन्त्र से—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६)।
सत्यता के साथ आहुति दी जाती है, क्योंकि जब सूर्य डूब जाता है तो अग्नि ही ज्योति रहती है।