शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
Page 251 of 699
Read in contextकां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / २३३
की देवताओं के लिए आहुति दे दूं, क्योंकि यह इनका है जिसको खाकर हम जीते हैं। वह जो दिन
में भोजन करता है वह यज्ञ-शेष है, जिसमें से बलि निकाला जा चुका हो। जो अग्निहोत्र करता
है वह यज्ञ के शेष भाग को खाता है ॥१२॥
इस विषय में कहा जाता है कि अन्य सब यज्ञ समाप्त हो जाते हैं परन्तु अग्निहोत्र
समाप्त नहीं होता। बारह वर्ष चलनेवाला यज्ञ भी अन्तवाला है, परन्तु अग्निहोत्र अन्तवाला
नहीं है। क्योंकि सायं को आहुति देकर जानता है कि प्रातःकाल आहुति दूंगा, और प्रातःकाल
आहुति देकर जानता है कि सायं को आहुति दूंगा। इसलिए अग्निहोत्र अनन्त है और इससे
अनन्त सन्तान उत्पन्न होती है। और जो मनुष्य अग्निहोत्र की अनन्तता को समझता है, उसके
अनन्त सन्तान और वैभव होता है ॥१३॥
दूध दुहकर (गार्हपत्य अग्नि पर) पकाने रखता है जिससे पक जावे। इस विषय में
कहते हैं कि जब उबाल आवे तब आहुति दे। परन्तु उबाल आ जायगा तो जल जायगा और जला
हुआ बीज उपजता नहीं। इसलिए उबाल न आने देना चाहिए ॥१४॥
आग पर चढ़ाकर ही आहुति दे, क्योंकि यह (दूध) अग्नि का वीर्य है। इसको आग पर
इसलिए रखते हैं कि गर्म हो जाय। इसलिए आग पर रखकर ही आहुति देनी चाहिए ॥१५॥
अब प्रकाशित करता है (अर्थात् तिनके जलाकर उसके प्रकाश से दूध को देखता है) कि
यह पक गया क्या ? अब उस पर जल छिड़कता है शान्ति के लिए तथा रस की वृद्धि के लिए।
जब बरसता है तब ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। ओषधियों को खाने और जल को पीने से यह रस
उत्पन्न होता है। इसलिए रस की वृद्धि के लिए वह जल छोड़ता है। इसलिए यदि 'केवल'
(खालिस) दूध पीना हो तो उसमें एक बूंद जल अवश्य मिला ले, शान्ति के लिए तथा रस की
वृद्धि के लिए ॥१६॥
अब वह दूध को चार (चमचों) में निकालता है, क्योंकि वह दूध चार प्रकार से (चार
थनों से) मिला था। अब वह समिद्ध होम के लिए समिधा को उठाता है और (चमसे को) बिना
नीचे रक्खे हुए पूर्व-आहुति देता है। यदि (चमसे को) नीचे रख देगा तो मानो वह किसी के लिए
खाना ले जाते हुए बीच मार्ग में रख दे। परन्तु बिना नीचे रक्खे हुए (आहुति देना) मानो
किसी को खाना ले जाते हुए पहले उसके पास पहुँचाकर (बर्तन) नीचे रक्खे। नीचे रखने के
बाद एक और (आहुति देता है)। इस प्रकार इन दो आहुतियों को नानावीर्य (भिन्न-भिन्न
पराक्रमवाली) बनाता है। ये दो आहुतियाँ मन और वाणी हैं। इस प्रकार मन और वाणी को
एक-दूसरे से अलग करता है। इस प्रकार मन और वाणी समान होते हुए भी नाना हैं ॥१७॥
दो बार अग्नि में आहुति देता है। दो बार (चमसे को) पोंछता है। दो बार (दूध)
खाता है। चार बार (चमसे में) निकालता है। ये दस (क्रियाएँ) हुईं। विराज् छन्द में दस
अक्षर होते हैं। विराज् ही यज्ञ है। इस प्रकार वह यज्ञ को विराज् बना देता है ॥१८॥
वह अग्नि में जो आहुति देता है, वह देवताओं के लिए देता है। इसी से देव (यज्ञों में)
सम्मिलित हैं। और जो पोंछ डालता है उसको पितरों और ओषधियों के लिए आहुति देता है।