शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / २३१
वह सायंकाल को अस्त होने पर इसलिए आहुति देता है कि (सूर्य) जो गर्भरूप है उसको
आहुति दी जाय, और चूंकि उसको गर्भ के रूप में आहुति देता है इसलिए यह गर्भस्थ जीव बिना
खाये जीते रहते हैं ॥४॥
प्रातःकाल उदय होने से पूर्व इसलिए आहुति देता है कि इस (सूर्यरूपी बालक) को जन्म
दे । वह तेज होकर चमकता हुआ निकलता है। अगर वह आहुति न देता तो कदापि न निकलता।
इसलिए वह आहुति देता है ॥५॥
जैसे सांप केंचुली छोड़ता है इसी प्रकार वह पाप-युक्त रात्रि को छोड़ता है। जो रहस्य
को समझकर अग्निहोत्र करता है वह उसी प्रकार पाप-युक्त रात्रि से छूट जाता है जैसे सांप
केंचुली से। उस (सूर्य) के छूटने पर सब प्रजा फिर से उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि वे अपने
प्रयोजन के अनुकूल बिचरते हैं ॥६॥
वह जो सूर्यास्त से पहले आहवनीय को (गार्हपत्य से) निकालता है—ये किरणें ही
विश्वेदेव (सब देव) हैं। इससे अधिक जो प्रकाशित होता है प्रजापति या इन्द्र है। अग्निहोत्र
करनेवाले के घर सब देवता पहुँच जाते हैं। और जो कोई आग न निकाल पावे और देवतागण
आ जायें तो वे चले जाते हैं। और जिसके यहाँ से देवतागण लौट जायें वह सफल नहीं होता।
और जिसके यहाँ से देवतागण चले गये और वह विफल हुआ, उसके विषय में लोग कहते हैं कि
चाहे यह जाने या न जाने, इसका सूर्यं अस्त हो गया क्योंकि इसने (गार्हपत्य से आहवनीय अग्नि
को) नहीं निकाला ॥७॥
सूर्यास्त से पहले आहवनीय निकालने का यह कारण है कि जब कोई बड़ा आने वाला
होता है तो घर को साफ करके सत्कार करते हैं, उसी प्रकार यह भी। क्योंकि जिस किसी के
अग्नि निकालने के पीछे (देवतागण) आते हैं, वे उसके आहवनीय गृह में घुस जाते हैं और उसी
आहवनीय गृह में ठहर जाते हैं ॥८॥
वह शाम को सूर्यास्त होने पर अग्नि में इसलिए आहुति देता है कि वह घर में प्रवेश
किये हुए (देवताओं) के लिए आहुति देता है। और सूर्योदय होने से पहले आहुति देने का प्रयोजन
यह है कि जब तक देव जाने न पावें, तब तक आहुति दी जाय। इसीलिए आसुरी का कहना था
कि सूर्योदय होने के पश्चात् आहुति देनेवालों का अग्निहोत्र व्यर्थ हो जाता है जैसे खाली घर में
कोई खाना ले जाय ॥६॥
जीविकाएँ दो प्रकार की हैं—जड़ वाली और बिना जड़ की। ये दोनों देवताओं की
हैं। इन्हीं के सहारे मनुष्य जीते हैं। पशु बिना जड़ के हैं और ओषधियाँ जड़वाली; बिना जड़-
वाले पशु जब जड़वाली ओषधियों को खाते और जल पीते हैं तब रस उत्पन्न होता है ॥१०॥
वह सूर्यास्त के पश्चात् शाम को आहुति इसलिए देता है कि इस जीवन-रस की आहुति
देवताओं के लिए दे दूँ, क्योंकि यह रस उन्हीं का है जिसको खाकर हम जीते हैं। और जो वह
रात्रि में भोजन करता है वह आहुति का शेष भाग है जिसमें से बलि निकाला जा चुका है
(अर्थात् अन्य जीवों के लिए भाग बाँट दिया गया हो)। क्योंकि जो अग्निहोत्र करता है वह यज्ञ
के शेष भाग को खाता है ॥११॥
और जो प्रातःकाल सूर्योदय से पहले आहुति देता है, वह सोचता है कि इस जीवन-रस