शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० २, अ० २-३, ब्रा० ४-१, कं० १५-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / २२६
किया। उसमें वीर्य सींचा। वह दूध हो गया। इसलिए गाय जब तक कच्ची रहती है (वह दूध)
पकता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है। इसलिए चाहे काली गाय में हो चाहे लाल में, दूध
सफेद ही होता है, अग्नि के समान चमकता हुआ, क्योंकि अग्नि का वीर्य है। इसलिए जब वह
पहले दुहा जाता है तो गर्म होता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है ॥१५॥
उन्होंने (मनुष्य ने ?) कहा, 'इसकी आहुति दें।' (देवों ने कहा) 'ये पहले किसके
लिए आहुति देंगे ?' अग्नि ने कहा, 'मेरे लिए।' वायु ने कहा, 'मेरे लिए।' सूर्य ने कहा, 'मेरे
लिए।' वे निश्चय न कर सके और निश्चय न करके कहा, 'पिता प्रजापति के पास चलें। वे
जिसको पहली आहुति के योग्य बतायेंगे, लोग भी उसीको पहली आहुति देंगे।' वे पिता प्रजापति
के पास जाकर बोले, 'हममें से किसको लोग पहले आहुति देंगे ?' ॥१६॥
उसने कहा, 'अग्नि के लिए। अग्नि तुरन्त ही अपने वीर्य को उत्पन्न करेगा। इससे
तुम्हारी भी प्रजा होगी।' फिर सूर्य से कहा, 'इसके पश्चात् तुम्हारे लिए (आहुति दी जायगी)।
और जो (दूध) आहुति देने से बच रहा वह उसके लिए जो बहता है (वायु के लिए)। इसलिए
अब तक लोग इसी प्रकार आहुति देते हैं-सायंकाल में अग्नि के लिए और प्रातःकाल में सूर्य के
लिए; और जो आहुति देने से बच रहता है वह वायु के लिए ॥१७॥
आहुति देकर देवों ने उस प्रकार अपने को प्रजा के रूप में उत्पन्न किया जिस प्रकार
उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन्होंने वह विजय पाई जो सचमुच पाई। अग्नि ने यह लोक जीता,
वायु ने अन्तरिक्ष और सूर्य ने द्यौ । जो कोई इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है उसके
उसी प्रकार प्रजा होती है जैसे देवों के हुई, और वह उसी प्रकार विजय पाता है जैसे देवों ने।
जो इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है वह (उन देवों के साथ) इस लोक का हिस्सेदार
होता है। इसलिए अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥१८॥
अध्याय ३-ब्राह्मण १
सूर्य ही अग्निहोत्र है। क्योंकि वह इस आहुति के पहले उदय हुआ, इसलिए सूर्य अग्निहोत्र
है ॥१॥
सायंकाल को अग्निहोत्र = (अग्ने होत्रस्य) अस्त होते हुए सूर्य के बाद आहुति देता है तो
सोचता है कि जो यह है इसके यहाँ रहते हुए मैं आहुति दे दूँ। और जो सूर्योदय से पहले प्रातः-
काल के समय आहुति देता है तो सोचता है कि जो यह है उसके यहाँ रहते हुए आहुति दूँ।
इसलिए 'सूर्य ही अग्निहोत्र है' ऐसा कहते हैं ॥२॥
अब जब वह अस्त हो जाता है तब अग्निरूपी योनि में गर्भ होकर प्रवेश करता है, और
उसके गर्भ होने पर यह सब प्रजा गर्भ हो जाती है। थपथपाये जाकर मानो वे सन्तुष्ट होकर
सो जाते हैं। रात्रि उस (सूर्य) को इसलिए छिपा लेता है कि गर्भ भी तो छिपा रहता है ॥३॥