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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 243 of 699

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Page 243

कां० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / २२५
कहते हैं 'वसुवने वसुधेयस्य' ॥२७॥
इसकी दक्षिणा है स्वर्ण। यह यज्ञ अग्नि का है और स्वर्ण अग्नि का रेत अर्थात् वीर्य है।
इसलिए स्वर्ण दक्षिणा है, या बैल, क्योंकि बैल का कन्धा अग्नि का होता है। इसका कन्धा
अग्नि से दग्ध-सा होता है। दूसरे, अग्नि देवों का ढोनेवाला है, और बैल मनुष्यों का बोझ ढोने-
वाला है। इसलिए बैल दक्षिणा (में दिया जाता है) ॥२८॥
अग्निहोत्रम्
अध्याय २—ब्राह्मण ४
यहाँ पहले एक प्रजापति ही था। उसने सोचा, मैं कैसे उत्पन्न (प्रकट) होऊँ? उसने
श्रम और तप किया। उसने मुख से अग्नि को उत्पन्न किया। चूंकि उसको मुख से उत्पन्न किया
इसलिए अग्नि अन्न का खानेवाला है। जो इस प्रकार अग्नि का अन्न को खानेवाला जानता
है वह अन्न का खानेवाला होता है ॥१॥
इस अग्नि को देवों से पहले उत्पन्न किया, इसलिए अग्नि का अग्रि नाम है। अग्नि
और अग्रि एक बात है। वह उत्पन्न होकर पूर्व की ओर अर्थात् आगे गया। जो पहले (पूर्व)
जाता है उसको कहते हैं आगे (अग्रे) गया। यही अग्नि की अग्रिता है ॥२॥
प्रजापति ने सोचा कि मैंने इस अग्नि को अपना अन्न खानेवाला बनाया है, और मुझे
छोड़कर और कोई अन्न तो है ही नहीं; और मुझे वह खायेगा नहीं। उस समय पृथिवी गंजी थी।
न ओषधियाँ थीं, न वनस्पतियाँ। उसको इसी बात का सोच था ॥३॥
अब (अग्नि) उसकी ओर मुंह फाड़कर दौड़ा। वह डर गया और उसकी महिमा चली
गई। वाणी ही उसकी महिमा है। यह वाणी ही चली गई। उसने अपने में ही आहुति की इच्छा
की, और (हाथ) मले। चूंकि हाथ मले, इसीलिए ये (हथेलियाँ) लोभरहित होती हैं। अब
उसने घी की आहुति या दूध की आहुति ली। ये दोनों दूध ही तो हैं ॥४॥
वह उसे पसन्द न आई क्योंकि वह केशमिश्रित (बालों से मिली हुई) थी। उसने उसे
(आग में) डाल दिया यह कहकर—'ओषं धय' (जलते हुए खा)। इससे 'ओषधि' उत्पन्न हुई।
इसीलिए उनका नाम 'ओषधि' है। अब फिर उसने हथेलियाँ मलीं। तब दूसरी आहुति मिली।
घी की आहुति या दूध की आहुति, ये दोनों दूध ही तो हैं ॥५॥
वह उसको पसन्द आ गई। उसे संकोच हुआ, 'इसे (आग में) छोड़ूँ या न छोड़ूँ।' उसकी
महिमा ने कहा, 'आहुति दे।' प्रजापति ने जाना कि यह तो मेरी ही (स्व) महिमा है जो कह रही
है (आह)। इसलिए उसने 'स्वाहा' कहकर आहुति दे दी। इसलिए 'स्वाहा' कहकर आहुति दी
जाती है। अब वह निकला जो तपता है अर्थात् सूर्य, और वह आया जो बहता है अर्थात् वायु।