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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 237

का० २, अ० २, ब्रा० ३, क० १-७ शतपथब्राह्मण / २१६
का आधान कीजिये।' उसने उत्तर दिया, 'ऐसा मत कहो। वाणी का संयम करो। जो आहिताग्नि
है उसे झूठ नहीं बोलना चाहिए। अच्छा हो कि वह कुछ न बोले। परन्तु झूठ बोले ही नहीं। इस-
लिये सत्य ही उपचार है' ॥२०॥
पुनराधेयम्
अध्याय २—ब्राह्मण ३
वरुण ने इस (अग्नि) का राज्य की कामना से आधान किया। उसने राज्य को पा लिया।
इसलिए चाहे कोई (अग्न्याधान करनेवाला) जाने या न जाने, लोग उस (अग्न्याधान करने-
वाले) को 'वरुण राजा' कहते हैं। सोम ने यश की कामना से (अग्न्याधान किया), वह यशस्वी
हो गया। इसलिए चाहे कोई सोम का लाभ करे या न करे, दोनों ही यश पाते हैं, क्योंकि लोग
यश को ही देखने आते हैं। जो पुरुष इस रहस्य को समझकर अग्न्याधान करता है वह यशस्वी
होता है और राज्य को प्राप्त होता है ॥१॥
देवों ने सब रूपों को अग्नि के सुपुर्द कर दिया, चाहे वह ग्राम-सम्बन्धी हो या अरण्य-
सम्बन्धी; चाहे विजय करने की इच्छा से, चाहे स्वतन्त्र विचरने के लिए; चाहे यह सोचकर कि
(अग्नि) अच्छा रक्षक है इनकी रक्षा करेगा' ॥२॥
अग्नि को उनका लोभ हो गया। वह उनको इकट्ठा करके ऋतुओं में छिप गया। देवों
ने सोचा कि वहीं चलें। जहाँ अग्नि छिपा हुआ था, वहीं गये। वे निराश हो गये कि 'क्या करना
चाहिए?' 'क्या राय है ?' ॥३॥
तब त्वष्टा ने पुनराधेय अग्नि (फिर रक्खी हुई अग्नि) को देखा। उसने उसका आधान
किया और इस प्रकार अग्नि के प्रिय धाम को पहुँच गया। उस (अग्नि) ने उस (त्वष्टा) के
लिए दोनों रूप अर्थात् ग्राम-सम्बन्धी और अरण्य-सम्बन्धी छोड़ दिये। इसीलिए इन रूपों को
त्वाष्ट्र (त्वष्टा) कहते हैं, क्योंकि त्वष्टा से ही ये सब रूप आते हैं। परन्तु दूसरी प्रजा इस-इस
प्रकार रहती है ॥४॥
इसलिए (मनुष्य को चाहिए) कि त्वष्टा के लिए ही पुनराधेय करे। इसी प्रकार वह
अग्नि के प्रिय धाम का लाभ कर सकता है। और वह (अग्नि) उसके लिए दोनों रूप छोड़ देता
है अर्थात् ग्राम के भी और अरण्य के भी। उसी में ये दोनों रूप दिखाई पड़ते हैं। वह बड़ा हो
जाता है, लोग उससे डाह करते हैं। वह फूलता-फलता है और लोक में उसका यश होता है ॥५॥
यह यज्ञ अग्नि का है। अग्नि ज्योति है। यह पापों को जलाती है। यह उस (यजमान)
के पापों को भी जलाती है। यही ज्योति श्री और यश को देनेवाली होती है। ज्योति दूसरे लोक
में पुण्य का मार्ग बनाती है। इसलिए (फिर) आधान करना चाहिए ॥६॥
वर्षा में पुनराधान करे। वर्षा ही सब ऋतुओं का (प्रतिनिधि) है। वर्षा ही सब ऋतुएँ
हैं। इसीलिए कहते हैं कि अमुक वर्ष में यह काम किया, अमुक वर्ष में यह काम किया। वर्षा सब
ऋतुओं का एक रूप है। जब कहते हैं 'यह ग्रीष्म-सा है' तो यह वर्षा में ही है और जब कहता है
कि 'आज शिशिर-सा है' तो यह भी वर्षा ही है। 'वर्ष से ही 'वर्षा' है ॥७॥