शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० २, अ० २, ब्रां० २, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / २१५
अध्याय २—ब्राह्मण २
जब यज्ञ को करते हैं तो उसका आघात करते हैं। जब (सोम) राजा को निचोड़ते हैं
तो उसका आघात करते हैं। जब पशु को मारते या काटते हैं तो उसका आघात करते हैं। ऊखल
और मूसली से तथा (चक्की के) दोनों पत्थरों से हवि का आघात करते हैं ॥१॥
मारा हुआ यज्ञ शक्ति-रहित हो गया (दक्ष न रहा)। देवों ने दक्षिणा देकर उसको दक्ष
बनाया। चूँकि दक्षिणाओं द्वारा उसको दक्ष बनाया, इसलिए इनका दक्षिणा नाम पड़ा। इन
दक्षिणाओं के द्वारा उन्होंने उस (यज्ञ) को दक्ष बनाया। यज्ञ समृद्ध (शक्तिशाली) हो जाता
है, इसीलिए दक्षिणा दी जाती है ॥२॥
(दक्षिणा में) छः (गौएँ) दे। संवत्सर में छः ऋतुएं होती हैं। संवत्सर यज्ञ-प्रजापति है।
जितना यज्ञ है, जितनी उसकी मात्रा है, उतनी ही दक्षिणाओं से इसको दक्ष बनाता है ॥३॥
बारह (गौयें) दे। संवत्सर के बारह मास होते हैं। संवत्सर यज्ञ-प्रजापति है। जितना
बड़ा यज्ञ है, जितनी उसकी मात्रा है, उतनी ही दक्षिणाओं से उसको दक्ष बनाता है ॥४॥
चौबीस दे। संवत्सर के चौबीस अर्द्धमास (पक्ष) होते हैं। संवत्सर यज्ञ-प्रजापति है।
जितना बड़ा यज्ञ होता है, जितनी उसकी मात्रा होती है, उतनी ही दक्षिणाओं से वह उसको दक्ष
बनाता है। दक्षिणाओं की यह मात्रा है, या श्रद्धा हो तो अधिक भी दे। दक्षिणा इसलिए दी
जाती है कि—॥५॥
दो प्रकार के देव होते हैं। देव तो देव ही हैं और जो ब्राह्मण वेदों के जाननेवाले और
उपदेश करने वाले हैं वे मनुष्य-देव हैं। उनका यज्ञ दो भागों में विभक्त है। देवों की आहुतियां
हैं, और मनुष्यदेव, ब्राह्मण, वेदज्ञ, वेदोपदेष्टाओं की दक्षिणा। आहुतियों से देवों को प्रसन्न करता
है और मनुष्य-देव, ब्राह्मण, वेदज्ञ, वेदोपदेष्टाओं को दक्षिणाओं से। दोनों प्रकार के देव प्रसन्न
होकर उसके लिए सुधा (अमृत) देते हैं ॥६॥
जैसे योनि में वीर्य रक्खा जाता है इसी प्रकार ऋत्विज लोग यजमान को (स्वर्ग) लोक
में रखते हैं, जब कि वह इनको दक्षिणा देता है कि वे उसे वहाँ पहुँच देंगे। दक्षिणाओं के विषय
में (यह बात हुई) ॥७॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान (बड़ाई के लिए) झगड़ने लगे। वे दोनों
आत्मा-रहित थे, क्योंकि वे मर्त्य थे। जो मर्त्य होता है वह आत्मा-रहित होता है। इन दोनों
मर्त्यो में केवल अग्नि ही अमर था। और इसी अमर के सहारे वे दोनों जीते थे। अब (असुरों ने)
जिस (देव) को मारा वही मर गया ॥८॥
अब देव निर्बल हो गये। अब वे पूजा करते और तप करते रहे कि अपने शत्रु मर्त्य
असुरों पर विजय पा सकें। उन्होंने इस अमर अग्न्याधेय को देखा ॥६॥
उन्होंने कहा, 'हम इस अमर को अपने आत्मा के भीतर धरें। हम इस अमृत को अपने