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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 227 of 699

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Page 227

का० २, अ० १-२, ब्रा० ४-१, कं० २७-३० व १-३ शतपथब्राह्मण / २०६
इसमें कोई व्यथा अर्थात् आपत्ति नहीं होती। आसुरि, पाञ्चि और माधुकि इस अग्नि को कुछ
पश्चिम की ओर हटाकर रखते थे। उनका कथन था कि (अग्नि के छूने से) सब चीजें कुछ हट
जाती हैं, इसलिए पहले ही उठाकर ‘भूर्भुवः स्वः’ से आधान करना चाहिए। परन्तु जैसा चाहे
करे ॥२७॥
अब (यजमान) (अग्नि के) पूर्व की ओर मुड़ता है और जलती हुई समिधाओं का
पूर्वार्ध पकड़कर कहता है—‘‘द्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्णा’’ (यजु० ३।५)—‘‘द्यौ के समान
बहुत और पृथिवी के समान विस्तृत।‘‘ ‘द्यौरिव भूम्ना’ कहने से तात्पर्य यह है कि जैसे द्यौलोक
में बहुत-से नक्षत्र हैं, इसी प्रकार मैं भी बहुत हो जाऊँ। और ‘पृथिवीव वरिम्णा’ कहने से
तात्पर्य यह है कि जैसे पृथिवी बड़ी है वैसे ही मैं भी हो जाऊँ। अब कहता है—‘‘तस्यास्ते पृथिवि
देवयजनि पृष्ठे’’ (यजु० ३।५)—‘हे देव-यज्ञ के योग्य पृथिवि, उस तेरी पीठ पर।‘‘ क्योंकि इसी
की पीठ पर आधान करता है। अब कहता है—‘‘अग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे’’ (यजु० ३।५)—
‘‘अन्न के खानेवाले अग्नि को अन्न की प्राप्ति के लिए रखता हूँ।’’ अग्नि अन्न का खानेवाला
है। ऐसा कहने से तात्पर्य यह है कि मैं अन्न को खानेवाला होऊँ। यह आशीर्वाद है। चाहे तो
जपे और चाहे तो छोड़ दे ॥२८॥
अब सर्प-राज्ञी वाली (तीन) ऋचाओं को पढ़कर खड़ा रखता है—‘‘आयं गौः पृश्निर-
क्रमीदसद्न्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः ॥१॥ अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणदपानती। व्यख्यन्
महिषो दिवम् ॥२॥ त्रिंशद्धाम विराजति वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोरह द्युभिः ॥३॥
(यजु० ३।६,७,८ या ऋग्वेद १०।१८९।१,२,३) ।
[टिप्पणी—इन मन्त्रों की ऋषिका सर्पराज्ञी है)—‘‘यह पृश्नि (चितकबरी) गौ आई
और मा के आगे खड़ी हो गई। और पिता के आगे स्वर्लोक को हुई’’ ॥१॥ ‘‘इसके प्राण से साँस
लेती हुई चमकनेवाले अन्तरिक्ष के बीच में चलती है। बड़े (पदार्थ) द्वारा द्यौलोक की व्याख्या
करती हुई’’ ॥२॥ ‘‘तीन सौ धामों के ऊपर विराजती है। वाणी पतङ्ग (सूर्य) के लिए धारण
की जाती है। प्रातःकाल प्रकाशों के द्वारा’’] ॥३॥
वह इन सर्पराज्ञीवाली ऋचाओं को खड़े-खड़े इसलिए पढ़ता है कि जिस वस्तु की प्राप्ति
उसको यज्ञ की तैयारी से, या नक्षत्रों से, या ऋतुओं से, या अग्न्याधान से न हो सकी, वह सब
इससे हो जाती है ॥२९॥
परन्तु कुछ लोगों का कहना है कि सर्पराज्ञीवाली ऋचाओं को खड़े-खड़े पढ़ने की
आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह पृथिवी ही सर्पराज्ञी है। जब पृथिवी में अग्न्याधान किया जाता है तो
सब कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। इसलिए सर्पराज्ञीवाली ऋचाओं को खड़े-खड़े पढ़ने की
आवश्यकता नहीं ॥३०॥
अध्याय २—ब्राह्मण १
आहवनीय अग्नि को निकालकर पूर्ण आहुति देता है। पूर्ण आहुति इसलिए देता है कि
वह अपने लिए (अग्नि को) अन्न का खानेवाला बनाता है। इसलिए वह उसको अन्न देता है।
जैसे उत्पन्न हुए कुमार या बछड़े के लिए स्तन पिलाते हैं, उसी प्रकार वह इसको अन्न देता है ॥१॥
इस अन्न से शान्त होकर (अग्नि) आनेवाली हवियों के पकाने की प्रतीक्षा करता है।
यदि उस (अग्नि) में यह आहुति न दी जाय तो वह अध्वर्यु को या यजमान को जला दे क्योंकि
यही उसके पास होकर चलते हैं। इसीलिए वह उसको यह आहुति देता है ॥२॥
इस आहुति को (चमसे में) पूरा भरकर देता है। पूर्ण का अर्थ है ‘सब’। इस प्रकार