Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 223 of 699

Read in context
Page 223

कां० २, अ० १, ब्रा० ४, क० ८-१७ शतपथब्राह्मण / २०५
पश्चात् पूर्व की ओर ले जाते हैं तो दोनों अग्नियां सूर्योदय के पूर्व की ही हो जाती हैं। सूर्योदय
के पश्चात् आहवनीय को मथने से भी यही कार्य निकल सकता है ॥८॥
देव दिन हैं। पितर पाप-शून्य नहीं हैं, (अर्थात्) सूर्य ने पितरों के पाप छुटाये नहीं;
इसलिए जो सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथता है वह पापों से मुक्त नहीं होता। और पितर अमर
नहीं हैं इसलिए वह जो सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथता है, पूर्ण आयु से पूर्व मर जाता है। जो
पुरुष इस रहस्य को समझकर सूर्योदय के पश्चात् अग्नि को मथता है, वह पापों से छूट जाता है
क्योंकि देव पापों से मुक्त हैं। और यद्यपि अमर नहीं होता तो भी पूर्ण आयु को अवश्य प्राप्त
होता है क्योंकि देव अमर हैं। श्री को प्राप्त होता है क्योंकि देव श्री हैं। यश को प्राप्त होता है
क्योंकि देव यश हैं ॥९॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि यदि ऋक्, साम और यजुः से अग्न्याधान न किया जाय
तो किससे किया जाये ? (इसका उत्तर यह है कि) यह अग्नि ब्रह्म की है इसलिए ब्रह्म से ही
इसका आधान होना चाहिए। वाणी ब्रह्म है। उसी वाणी का यह (अग्नि) है। ब्रह्म सत्य है
और इन व्याहृतियों में सत्य है। इसलिए सत्य के द्वारा इसका आधान होता है ॥१०॥
प्रजापति ने 'भू' से इस (पृथिवी) को उत्पन्न किया, 'भुवः' से अन्तरिक्ष को और 'स्वः'
से द्यौलोक को। ये जो तीन लोक हैं उतना ही जगत् है। इसलिए 'सब' से ही आधान किया
जाता है ॥११॥
प्रजापति ने 'भू' से ब्राह्मण उत्पन्न किये, 'भुवः' से क्षत्रिय और 'स्वः' से वैश्य। ये जो
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं इतना ही सब जगत् है, इसलिए 'सब' से ही आधान किया जाता
है ॥१२॥
प्रजापति ने 'भू' से आत्मा को, 'भुवः' से प्रजा को और 'स्वः' से पशुओं को उत्पन्न
किया। ये जो आत्मा, प्रजा और पशु हैं उतना ही यह सब जगत् है, इसलिए 'सब' से ही आधान
किया जाता है ॥१३॥
वह 'भूर्भुवः' से गार्हपत्य अग्नि का आधान करता है। यदि सब (तीनों व्याहृतियों) से
आधान करता तो आहवनीय का आधान किससे करता ? इसलिए दो अक्षर (स्वः) छोड़ देता
है। इससे (शेष तीन अक्षर) अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। इन पाँचों अक्षरों से अर्थात्
'भूर्भुवः स्वः' से आहवनीय का आधान करता है। इस प्रकार आठ अक्षर हो जाते हैं। गायत्री में
भी आठ अक्षर होते हैं। गायत्री अग्नि का छन्द है। इस प्रकार वह (अग्नि का) आधान
(अग्नि के ही) छन्द से करता है ॥१४॥
देवों ने अग्नियों का आधान करना चाहा। असुर और राक्षसों ने उनको रोका (और
कहा कि) 'अग्नि उत्पन्न न होगी', 'अग्नि का आधान मत करो।' चूंकि उन्होंने रोका (अरक्षन्)
इसलिए 'रक्ष' धातु से उनका नाम राक्षस पड़ा ॥१५॥
तब देवों ने इस वज्र अर्थात् 'अश्व' को देखा। उन्होंने उसको सामने खड़ा कर लिया
और उसके भयरहित, शत्रुरहित संरक्षण में अग्नि को उत्पन्न किया। इसलिए जहाँ अग्नि को
मथना हो वहाँ अश्व को ले जाओ, ऐसा (अध्वर्यु अग्नीध्र को) बोले। वह सामने खड़ा होता
है, वज्र को उठाता है और उसके भयरहित और शत्रु-शून्य संरक्षण में अग्नि उत्पन्न होती
है ॥१६॥
इसको पूर्ववाट् (पूर्व को चलनेवाला या शायद अगुआ या युवा घोड़ा) होना चाहिए,
क्योंकि इसमें अपरिमित वीर्य होता है। यदि पूर्ववाट् अश्व न मिले तो जैसा अश्व मिले वही
सही। यदि अश्व न मिले तो अनड्‌वान (बैल) ही ले ले, क्योंकि यह (अग्नि) बैल का बन्धु