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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 213 of 699

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Page 213

कां० २, अ० १, ब्रा० १-२, कं० ७-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / १६५
बाहर निकाल डाला। इसलिए वह अग्नि को पृथिवी के इस रस से युक्त करता है। यही कारण
है कि वह आखु-करीष को लाता है। जो श्री को प्राप्त कर लेता है, उसे पुरीष्य कहते हैं। पुरीष
और करीष एक ही बात है। इसलिए इसकी बढ़ोतरी के लिए आखु-करीष को लाता है ॥७॥
अब वह कंकड़ (शर्करा) लाता है। देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान अपनी
बड़ाई के लिए झगड़ने लगे। यह पृथिवी कमल के दल के समान कांपने लगी, क्योंकि वायु इसको
डगमगा रही थी। वह कभी देवों के पास जाती और कभी असुरों के। जब वह देवों के पास
पहुँची तो—॥८॥
उन्होंने कहा, लाओ हम इसको दृढ़ कर लें; और जब यह दृढ़ और अचल हो जाय तो
दोनों अग्नियों का आधान करें। इससे हम अपने शत्रुओं को यहाँ से बिल्कुल निकाल देंगे ॥९॥
इसलिए जैसे खूंटियों से चमड़े को तानते हैं, उसी प्रकार इसको दृढ़ किया; और यह
अचल और दृढ़ हो गई। उसी दृढ़ अचल भूमि पर दो अग्नियों का आधान किया; और तब
उन्होंने शत्रुओं को इसके भाग से बिल्कुल निकाल दिया ॥१०॥
इसी प्रकार यह (अध्वर्यु) भी कंकड़ों (शर्करा) से इसको दृढ़ करता है; और उस दृढ़
निश्चल पृथिवी में दो अग्नियों को स्थापित करता है; और शत्रुओं को मार भगाता है, इसलिए
कंकड़ों को लाता है ॥११॥
इस प्रकार ये पाँच तैयारियां हैं क्योंकि यज्ञ पाँच भागों वाला (पांक्त) और पशु भी
पाँच भागों वाला है; और वर्ष में पाँच ऋतुएं भी हैं ॥१२॥
इसके विषय में उनका कहना है कि साल में छः ऋतुएं हैं। न्यून के जोड़े से ही सन्तान
उत्पन्न होती है। न्यून शरीर (के नीचे के स्थान) से ही यह प्रजा उत्पन्न होती है। यह भी
(यजमान के लिए) श्रेयस्कर है। इसलिए पाँच तैयारियां होती हैं। और जब वर्ष की छः ऋतुएं
होती हैं तो छठी अग्नि होती है। इसलिए कोई न्यूनता नहीं हुई। [तात्पर्य यह है कि पाँच
संभारों में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं माननी चाहिए। पाँच ऋतुओं के लिए पाँच संभार हो
गये। यदि कोई कहे कि ऋतुएं छः होती हैं इसलिए पाँच संभारों से न्यूनता पाई जायगी, तो
इसका उत्तर यह है कि न्यूनता बुरी नहीं, क्योंकि न्यून से ही तो सन्तान होती है। दूसरी बात यह
है कि यदि छः ऋतुएं मानो तो पाच संभारों के साथ-साथ (अर्थात् जल, स्वर्ण, नमक, आखु-
करीष और शर्करा) छठा अग्नि भी तो है। इससे छः संख्या भी पूरी हो गई और पाँच ही
संभार ठीक ठहरे ॥१३॥
कुछ लोगों का मत है कि एक भी संभार नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस पृथिवी में तो
सभी चीजें हैं। जब इसी पृथिवी में अग्नि को स्थापित किया तो मानो सभी संभार प्राप्त हो गये।
इसलिए किसी संभार की आवश्यकता नहीं। परन्तु उसको संभारों को एकत्रित करना ही
चाहिए। क्योंकि जब वह इस पृथिवी में अग्नि का आधान करता है तब सभी संभारों को प्राप्त
होता है और जो कुछ संभारों का लाभ है वह उसको भी प्राप्त हो जाता है। इसलिए संभारों को
इकट्ठा करना ही चाहिए ॥१४॥
अध्याय १—ब्राह्मण २
अग्नियों का आधान कृत्तिका नक्षत्रों में करे। कृत्तिका अग्नि के नक्षत्र हैं। जो अग्नि के
नक्षत्र में अग्नियों का आधान करता है वह सलोम (अनुकूलता) स्थापित करता है। इसलिये
कृत्तिका नक्षत्र में अग्न्याधान करे ॥१॥
अन्य नक्षत्र एक, दो, तीन अथवा चार होते हैं (जबकि कृत्तिका सात होते हैं), इसलिए
कृत्तिका बहुल हुए। इस प्रकार बहुत्व को प्राप्त होता है इसलिए अग्न्याधान कृत्तिका नक्षत्र में