शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextअध्याय १-ब्राह्मण १
(दर्शपूर्णमास इष्टि करने का) व्रत करनेवाला मनुष्य आहवनीय और गार्हपत्य
अग्नियों के बीच पूर्वाभिमुख खड़ा होकर जल का स्पर्श करता है। जल क्यों छूता है ? इसलिये
कि मनुष्य अपवित्र है, वह झूठ बोलता है। जल के स्पर्श से उसकी शुद्धि हो जाती है। जल
वस्तुतः पवित्र है। प्रयोजन यह है कि 'पवित्र होकर व्रत करूँ'। जल वस्तुतः पवित्र है। 'पवित्र
के द्वारा पवित्र होकर मैं व्रत करूँ' ऐसा सोचता है। इसीलिये जल का स्पर्श करता है ॥१॥
आहवनीय अग्नि की ओर देखकर वह व्रत करता है इस मंत्र से (यजु० १।५) -
"हे व्रत के पालक अग्नि, मैं व्रत करना चाहता हूँ। मैं व्रत का पालन कर सकूँ। मैं इस योग्य हो
जाऊँ।" अग्नि देवों का व्रतपति है। इसीलिये अग्नि को सम्बोधन करके कहता है कि "मैं व्रत
करना चाहता हूँ। मैं व्रत का पालन कर सकूँ। मैं इस योग्य हो जाऊँ"। शेष स्पष्ट है ॥२॥
इष्टि के समाप्त होने पर व्रत को समाप्त करता है (यजु० २।२८ से) - "हे व्रतपते
अग्नि ! मैंने व्रत किया। मैं उसको कर सका। मैं इस योग्य हो सका।" वस्तुतः जिसने यज्ञ को
समाप्त किया वह व्रत को पाल सका। वह व्रत-पालन के योग्य हो सका। प्रायः यज्ञ करनेवाले
इसी प्रकार व्रत करते हैं। इस प्रकार भी व्रत करे ॥३॥
दो ही बातें होती हैं, तीसरी नहीं- एक सत्य और दूसरी अनृत - देव सत्य हैं, मनुष्य
अनृत। यह जो मंत्र में कहा कि 'झूठ से सत्य को प्राप्त होऊँ' उसका तात्पर्य यह है कि 'मनुष्यों
में से एक था, देवों में से एक हो जाऊँ' (मनुष्यत्व छूटकर देवत्व आ जावे) ॥४॥
उसे सत्य ही बोलना चाहिये । देव सत्यरूपी व्रत का पालन करते हैं। इसी से उनको
यश मिलता है। जो इस रहस्य को समझकर सत्य बोलता है उसको यश मिलता है ॥५॥
यज्ञ की समाप्ति पर वह व्रत को समाप्त करता है इस मंत्र से (यजु० २।२८) 'मैं जो
था वही हो गया'। जब उसने व्रत किया था तो वह अमानुष अर्थात् देव हो गया था। ऐसा
कहना तो उसको उचित नहीं था कि 'मैं सत्य से अनृत को प्राप्त हो जाऊँ'। इसलिये यज्ञ करते
हुए देव की कोटि में होकर यज्ञ की समाप्ति पर जब वह मनुष्य की कोटि में आता है तो केवल
इतना कहता है, "मैं जो पहले था नहीं, अब हूँ" इस प्रकार व्रत को समाप्त करता है ॥६॥
अब प्रश्न है कि व्रत के मध्य में खावे या न खावे ? आषाढ सावयस मुनि का मत था कि
व्रत में खाना नहीं चाहिये । देव मनुष्य के मन को जानते हैं। वे जानते हैं कि जब उसने आज
व्रत किया है तो कल वह यज्ञ करेगा। वे सब देव उसके घर आते हैं। वे उसके घर में उपवास