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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 205

का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १८७
वह उन असुरों को देता है, अर्थात् (इस भूसी को) हिरन के लिए चमड़े के नीचे फेंक देता है।
इस प्रकार वह इसे अन्धकार में डालता है, जहाँ आग नहीं है। इसी प्रकार पशु का रक्त भी
अन्धकार में डालता है, यह कहकर कि तू राक्षसों का भाग है। इसलिए (यज्ञ में) प्रयुक्त नहीं
करते क्योंकि यह राक्षसों का भाग है ॥३५॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
यज्ञ की समाप्ति पर (अध्वर्यु) दक्षिण की ओर घूमकर पूर्णपात्र के जल को गिरा देता
है। इस प्रकार (संकेत से बताता है) उत्तर की ओर गिराया जाता है। इसलिए दक्षिण की
ओर घूमकर पूर्णपात्र को गिराता है। जो यज्ञ करता है वह इस कामना से करता है कि देवलोक
में स्थान मिले। उसका यह यज्ञ भी देवलोक को चला जाता है। इसके पीछे दक्षिणा चलती है,
जिसे वह (पुरोहित को) देता है। दक्षिणा को लेकर यजमान पीछे-पीछे आता है ॥१॥
मार्ग या तो देवयान होता है या पितृयान। दोनों ओर दो अग्नि-शिखाएँ जलती रहती
हैं। जो मुरसाने के योग्य होता है उसे मुरसाती हैं और जो निकल जाने के योग्य होता है उसे
निकल जाने देती हैं। जल शान्ति है इसलिए इसके द्वारा वह मार्ग को शान्त करता है ॥२॥
पूर्णपात्र को वह उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। इस प्रकार ‘सब’ से वह मार्ग को
शान्त करता है। वह निरन्तर बिना धार को तोड़े हुए उँडेलता है। इस प्रकार वह मार्ग को
निरन्तर लगातार शान्त करता है ॥३॥
वह पूर्णपात्र को इसीलिए उँडेलता है। यज्ञ में जो भूल हो जाती है वहाँ काट या फाड़
देते हैं। जल शान्ति हैं इसलिए जलरूपी शान्ति से शान्त करता है अर्थात् जलों से चंगा करता
है ॥४॥
पूर्ण (पात्र) को उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। ‘सब’ के द्वारा इसको चंगा करता है।
वह लगातार बिना धार तोड़े हुए उँडेलता है, इस प्रकार निरन्तर चंगा करता है ॥५॥
उसको अञ्जलि से लेता है यह मन्त्र पढ़कर—'सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि
मनसा सं ॓ शिवेन । त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्तो (तन्वो ?) यद् विलिष्टम्
(विलीष्टम् ?)”(यजु० २।२४)—“तेज, शक्ति, शरीरों और कल्याणकारी मन से हम मिल
गये। दानी त्वष्टा हमको धन दे; और जो कुछ हमारे शरीर में घाव था उसे चंगा कर दे।”
ऐसा कहकर जो व्रण था उसको चंगा कर देता है ॥६॥
अब मुख का स्पर्श करता है। मुख स्पर्श करने के दो कारण हैं—पहला, जल अमृत
है। अमृत से ही इसको स्पर्श करता है। दूसरे यह कि इस प्रकार वह इस कर्म को अपना (निजी)
कर लेता है। इसलिए मुख का स्पर्श करता है ॥७॥
अब वह विष्णु के पगों को चलता है। जो यज्ञ करता है वह देवों को प्रसन्न करता है।
इस यज्ञ द्वारा ऋचाओं से, यजुषों से या आहुतियों से देवों को प्रसन्न करके वह उनका हिस्सेदार
होकर उन तक पहुँच जाता है ॥८॥
विष्णु के पगों को इसलिए चलता है—विष्णु यज्ञ है। उस (यज्ञ) ने देवों के लिए इस
विक्रान्ति (शक्ति) को प्राप्त कर लिया जो इस समय उनके पास है। पहले पद से इस (पृथिवी)