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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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Page 189

कां० १, अ० ८, ब्रा० ३, कं० २१-२७ शतपथब्राह्मण / १७१
विदा हों।” ये जो परिधियां हैं यही देवताओं के होता हैं, क्योंकि (परिधियाँ ही) अग्नि हैं।
उन्हीं को विदा करता है। इसलिये कहता है-‘स्वगा दैव्या होतृभ्यः ।’ अब कहता है-“स्वस्तिः
मानुषेभ्यः” अर्थात् “मनुष्य के सम्बन्धियों के लिए कल्याण हो ।” इसके द्वारा वह आशीष देता
है कि मनुष्य होता असफल न हो ॥२१॥
अब वह परिधियों को आग में डालता है। पहले मध्यपरिधि को यह मन्त्र पढ़कर डालता
है-‘यं परिधिं पर्यधत्थाऽअग्ने देवपणिभिर्गुह्यमानः । तं तऽएतमनु जोषं भराम्‍येष मेत् त्वदपचेत-
याता” (यजु० २।१७)—“हे अग्नि देव ! जिस परिधि को तूने अपने चारों ओर रक्खा जब तू
पणियों से छिपा हुआ था, मैं उस तुझको तेरी प्रसन्नता के लिए भरता हूँ। यह तेरे प्रतिकूल न
हो ।” शेष दोनों (परिधियों) को इस मन्त्रांश से डालता हैं—‘‘अग्नेः प्रियं पाथोऽपीतम्” (यजु०
२।१७)—“तुम दोनों अग्नि के प्रिय स्थान को प्राप्त हो” ॥२२॥
अब वह जुहू और उपभृत् को ग्रहण करता है। पहले जो वह (प्रस्तर को) चुपड़ता है
तो मानो वह आहुति देता हैं कि वह आहुति बनकर देवलोक को जा सके। इसीलिए वह जुहू
और उपभृत् को साथ-साथ पकड़ता है ॥२३॥
वह विश्वे देवों के लिए उनको ग्रहण करता है। क्योंकि जब कोई हवि ऐसी दी जाती है
जिसमें किसी देवता के लिए निर्देश न हो तो उसमें सभी देवता समझते हैं कि हमारा भाग है।
जब वह आज्य को लेता है और किसी देवता का निर्देश करके तो हवि को लेता नहीं, इसलिये वह
सब देवों के लिए लेता है। इसलिए वह उस हविर्यज्ञ में आज्य को ‘वैश्वदेव’ अर्थात् सब देवताओं
का बना देता है ॥२४॥
वह उनको इस मन्त्र से ग्रहण करता है-‘‘सं॑स्रवभागा स्थेषा बृहन्तः’’(यजु० २।१८)
“इषा अर्थात् शक्ति के द्वारा बड़े आप बचा हुआ भाग लेनेवाले होओ।” (‘संस्स्रव’ कहते हैं बचे
हुए को) अब कहता है-‘‘प्रस्तरेष्ठाः परिधेयाश्च देवाः’’ (यजु० २।१८) अर्थात् “हे प्रस्तर पर
बैठे हुए और परिधिवाले देव !” प्रस्तर और परिधियाँ तो आग में फेंकी जा चुकीं। अब कहता
है-‘इमां वाचमभि विश्वे गृणन्तः”(यजु०२।१८)-“इस वाणी को आप सब ग्रहण करते हुए।”
इससे बह वैश्वदेव (सब देवों वाली) करता है। अब कहता है—“आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादय-
ध्वँ॒ स्वाहा वाट्” (यजु० २।१८) - “इस आसन पर बैठो और स्वाहावाट् को चक्खो।” जैसे
वषट्कृत् हवि होता है वैसे ही यह भी है ॥२५॥
गाड़ी से जिसकी हवि लेते हैं उसकी ही गाड़ी की धुरी में (स्रुवों को) अलग करते हैं
कि जहाँ हम जोड़ें वहीं अलग करें, क्योंकि जहाँ जोड़ा करते हैं वहीं अलग करते हैं (गाड़ी के
जिस स्थान पर बैल जोते जाते हैं उसी स्थान पर खोले जाते हैं)। परन्तु पात्र से जिसकी हवि
ली जाय उसके लिए स्रुवों को स्फ्या पर रखकर (अलग करें) कि जहाँ जोड़ें वहीं अलग करें।
इसलिये जहाँ जोड़ते हैं वहीं अलग करते हैं ॥२६॥
ये जो स्रुच् (चमचे हैं) यही यज्ञ के दो बैल हैं। जब वह चलता है (यज्ञ आरम्भ
करता है) तब उनको जोतता है। अब यदि वह इसको रखकर ही अलग कर दे जैसे बैल को
(बिना खोले ही) बिठा दें, तो वह गिर पड़ेगा। स्विष्टकृत् में दोनों चमचों का विमोचन होता
होता है। अब वह इनको खोलता है अर्थात् विमोचन करता है। वह इनको अनुयाजों में फिर
जोतता है। अनुयाजों को करने के पश्चात् फिर इनका विमोचन करता है। वह इनको खोलता
है अर्थात् विमोचन करता है। जब वह इनका संप्रगृहण (साथ छूना) करता है तो फिर जोतता
है। जिस गति (यात्रा या कार्य) के लिए उनको जोतता है उसी गति के पार करने पर विमोचन
करता है। यज्ञ के पीछे ही प्रजा होती है। इसलिए यह पुरुष पहले जोतता है, फिर खोलता है।
फिर जोतता है और जिस गति के लिए उसने जोता था वह गति हो जाने के पश्चात् उसको
छोड़ देता है। वह इस मन्त्र को पढ़कर रखता है-‘घृताची स्थो धुर्यौ पातँ॒ सुम्ने स्थः सुम्ने मा